गुरुवार, 24 जुलाई 2014

बालटाल हिंसा:अब हम और सहन नहीं करेंगे--Gaurav Bhatti

बालटाल में हुई हिंसा के खिलाफ ज़ोरदार रोष प्रदर्शन

पुतला फूंक कर दी संघर्ष तेज़ करने की चेतावनी
लुधियाना: 23 जुलाई 2014: (मोहन लाल//पंजाब स्क्रीन):
बालटाल हिंसा के विरोध में रोष प्रदर्शनों का सिलसिला आज भी जारी रहा। श्री नीलकंठ सेवा सोसायटी ने सुभानी बिल्डिंग चौंक में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के खिलाफ ज़ोरदार रोष प्रदर्शन किया। अध्यक्ष गौरव भट्टी के नेतृत्व में हुए इस रोष प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों ने उम्र अब्दुल्ला के पुतले को जूते मारे और और उसे आग दिखाई। इस मौके पर इन लोगों ने जम्मू कश्मीर पुलिस के खिलाफ भी ज़बरदस्त नारेबाजी की  स्पष्ट कहा कि हिन्दू शरीफ अवश्य होते हैं पर कमज़ोर नहीं। 
अगर यह सिलसिला नहीं रुका तो हम इसका मुँहतोड़ जवाब देंगें। धरने प्रदर्शनों का सिलसिला तेज़ किया जायेगा। 
ज्ञान स्थल मंदिर के नज़दीक एकत्रित इस संगठन के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए गौरव भट्टी ने बहुत ही साफ़ शब्दों में कहा कि जम्मू-कश्मीर सरकार व वहां की पुलिस साजिश के तहत अलगाववादी ताकतों पर सख्त कार्रवाई करने के बजाय उन्हे प्रोत्साहित करके लंगर स्थलों पर हमले करने वाले देश विरोधियों को खुली छूट देकर अमरनाथ यात्रा में विघ्न डाल रही है, जिसे हिंदू समाज बर्दाश्त नहीं करेगा।
इस अवसर पर अमित दूआ,  जतिंदर सलूजा, साहिल सेठी, राहुल डंग, दीपक, यश, लव मैनी, कमल भाटिया, रोहित, आशू कुणाल, जतिन, इतिन, सुनील अंकुश, माणिक गोयल, सुशील मल्होत्रा, सूरज गगनेजा, लक्की, तरन कत्याल, पंकज आदि भी उपस्थित थे।

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

लाखों बैंक मुलाज़िम मना रहे हैं राष्ट्रीयकरण की 45वीं वर्षगांठ

साथ ही ले रहे हैं निजीकरण के दानव को रोकने का संकल्प 
लुधियाना:18 जुलाई 2014:(रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन//कैमरा: मोहन लाल):
बैंकों का राष्ट्रीयकरण किये जाने की ऐतिहासिक घटना को लम्बा समय व्यतीत हो चूका है। उस जनहित कदम की यादें ताज़ा करते हुए और संगठन की इस गौरवशाली जीत की 45 वीं वर्षगांठ के संबंध में जगह जगह कार्यक्रम किये जा रहे हैं। गौरतलब है कि कल 19 जुलाई को इसकी 45 वीं वर्षगांठ है। ख़ुशी के इस अवसर पर बैंक मुलाज़िम चिंतित भी थे। यह उपलब्धि अब खतरे में है। इस के सर पर लटक रही है निजीकरण की तलवार। लोग अच्छे कदमों का विकास करते हैं लेकिन हमारे यहाँ अच्छे कदमों को फिर से पीछे की तरफ लेजाने की साज़िशें  रची जा रही हैं। उन्होंने सावधान किया कि आजकल किसी देश को वष में करने के लिए सेना या हथियारों से जंग की  पड़ती बल्कि दुश्मन उस देश की अर्थ  व्यवस्था को ही अपने हाथों में कर लेता है।  यहाँ भी यही हो रहा है लेकिन हम इस कुचेष्टा को सफल नहीं होने देंगें।
लुधियाना में भी आल इण्डिया बैंक इम्प्लाईज़ एसोसिएशन (AIBEA) ने 19 जुलाई के दिन को  अखिल भारतीय मांग दिवस के रूप में मनाया।  संगठन के नेता और वर्कर सख्त गर्मी के बावजूद दूर दूर से आये थे पूरे जोश और संकल्प के साथ कि इस राष्ट्रीयकरण को हमें किसी भी रूप में कायम रखना है।  निजीकरण का दानव इसे निगलने न पाये इस पर नज़र रखनी है। सरकारी बैंकों के कामकाज को जानबूझ कर कमज़ोर करने की साज़िशों को नाकाम बनाना है। 
गौरतलब है कि अगर आज गाँव गाँव में आम इन्सान बैंक सेवाओं का लाभ ले पा रहा है तो इसका 
श्रेय राष्ट्रीकरण को ही जाता है। 
   विवरण                                                   1969                                          2014 
बैंक शाखाएं                                                 8268                                         85,000 
ग्रामी अर्ध शहरी शाखाएं                               1833                                         44,000 
जमाराशियां                                                 4,646 करोड़ रूपये                      80 लाख करोड़ रूपये 
अग्रिम                                                        3,599  करोड़ रूपये                    62 लाख करोड़ रूपये                 ग्राहकों की संख्या                                                                                          60 करोड़               
कृषि हेतु ऋण                                               162 करोड़ रूपये                         6,90,000  करोड़ रूपये    
कुल स्टाफ                                                    1,65,000                                   10,68,000 
प्रति शाखा औसत आबादी                              65,000:1                                  15,000:1 

इस शानदार हकीकत के बावजूद कुछ कड़वे सत्य अभी बाकी हैं। अभी भी देश में 50 करोड़ से अधिक लोगों के पास बैंक का खता नहीं है। पांच लाख से अधिक गाँवों में एक भी  है। इन कुछ कड़वे सत्यों को आधार बनाकर ही सरकार अपने कदम बढ़ा रही निजीकरण की ओर। दूसरी तरफ कार्पोरेट सेक्टर लगातार सार्वजनिक धन को बैंक ऋण अदा न करके लूटने में कामयाब है। इस तरह के डिफल्ट्रॉन को बैंक संगठन अपने तौर पर कई बार उनके नाम सार्वजनिक करके बेनकाब कर चुके हैं लेकिन सरकार इस मामले में कभी गंभीर नहीं दिखी। सरकार और पूंजीपति लगातार बैंकों के निजीकरण और बैंकों के विलय के प्रयासों में लगे हैं। 
जिन लोगों के खाते सरकारी बैंकों में  शून्य एकाउंट से भी खुल जाते हैं वे ज़रा निजी बैंकों में जा कर देखें की वहां खाता कैसे खुलता है? इस लिए बैंकों को निजीकरण से बचाने का संघर्ष केवल बैंक मुलाज़िमों का नहीं बल्कि आम जनता का भी होना चाहिए वरना आपके खाते, आपकी पूंजी सब कुछ पहुँच जायेगा पूंजीपतियों के निजी हाथों में। क्या आपको यह सब खतरनाक नहीं लगता?

सोमवार, 14 जुलाई 2014

Atarjeet on Election

ਲੇਖਕਾਂ ਦੇ ਇੱਕ ਹਿੱਸੇ ਨੇ ਦੱਸਿਆ ਕੰਪਿਊਟਰ ਸਿਸਟਮ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਨਾਕਾਮ

ਹਰਮੀਤ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਅਤੇ ਦੇਸ ਰਾਜ ਕਾਲੀ ਨੇ ਕੀਤੀ ਇਤਰਾਜ਼ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਲੇਖਕਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧਤਾ
ਜੇ ਸਾਡੀ ਗੱਲ ਨਾ ਸੁਣੀ ਗਈ ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਅਦਾਲਤ ਤੱਕ ਵੀ ਜਾਵਾਂਗੇ 

ਲੁਧਿਆਣਾ: ਕੇਂਦਰੀ ਪੰਜਾਬੀ ਲੇਖਕ ਸਭਾ ਦੀਆਂ ਚੋਣਾਂ ਸਮੇਂ ਪਹਿਲੀ ਵਾਰ ਵਰਤੇ ਗਏ ਕੰਪਿਊਟਰ ਸਿਸਟਮ ਨੂੰ ਸੰਗਠਨ ਦੇ ਕੁਝ ਮੈਂਬਰਾਂ ਨੇ ਬੁਰੀ ਤਰਾਂ ਨਾਕਾਮ ਦਸਦਿਆਂ ਇਸਨੂੰ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਰੱਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਕਾਬਿਲੇ ਜ਼ਿਕਰ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਦੀ ਸ਼ੁਰੁਆਤ ਪੰਜਾਬੀ ਭਾਸ਼ਾ ਅਤੇ ਸਾਹਿਤ ਵਿੱਚ ਚੰਗਾ ਨਾਮਣਾ ਖੱਟਣ ਵਾਲੇ ਜਨਮੇਜਾ ਸਿੰਘ ਜੌਹਲ ਨੇ ਬੜੇ ਚਾਵਾਂ ਨਾਲ ਕੀਤੀ ਸੀ। ਉਮੀਦ ਸੀ ਕਿ ਸਾਹਿਤਕ ਅਤੇ ਜੱਥੇਬੰਦਕ ਮਾਮਲਿਆਂ ਵਿੱਚ ਇਸ ਡਿਜਿਟਲ ਯੁਗ ਦੀ ਸ਼ੁਰੂਆਤ ਦਾ ਗਰਮਜੋਸ਼ੀ ਨਾਲ ਸਵਾਗਤ ਕੀਤਾ ਜਾਏਗਾ। ਹੁਣ ਵੀ ਆਸ ਕੀਤੀ ਜਾਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ਕਿ ਕਮੀਆਂ ਪੇਸ਼ਿਆਂ ਨੂੰ ਦੂਰ ਕਰਕੇ ਇਸ ਸਿਸਟਮ ਨੂੰ ਹੋਰ ਬੇਹਤਰ ਬਣਾ ਲਿਆ ਜਾਣਾ ਚਾਹਿਦਾ ਹੈ। --ਰੈਕਟਰ ਕਥੂਰੀਆ

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शनिवार, 7 जून 2014

शुद्ध हिंदी के जादू को जगाता जनाब नीरज का एक यादगारी गीत

कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे

Courtesy:krhapa pukhtunkhwa//YouTube //Uploaded on Apr 8, 2011
Courtesy Photo
 नीरज साहिब का एक यादगारी गीत जो आज भी ज़िंदगी की हकीकत को हिंदी के शुद्ध शब्दों में पूरी शिद्दत से बताता है। ज़रा ध्यान से सुनिए उअर चाहें तो साथ साथ पढ़ भी सकते हैं। ज़िंदगी के हर कदम का अहसास दिलाता और साथ ही उसका हिसाब मांगता---यह मधुर सा गीत----। 
Film.........नई उम्र  की नई फ़स्ल 
Singer.............मोहम्मद रफ़ी 
Lyrics...............नीरज j
Music...............रौशन 
Starring...........Tanuja..Shobhan samrath..s.k.prem..ulhas & leela chitnis.. lyrics,with english translation provided by ASAD at the following site.excellent work.....
http://www.hamaraforums.com/index.php... .........karvan guzar gaya.......
(dreams wilted like flowers,friends hurt like thorns.All embellishments were like autumn tree adorns.The passing of spring:we just stood and watched,dust was all we saw,when the caravan had passed.
Before we had woken up,darkness held sway before our feet could get a grip,life slipped away.
Every leaf fell from the branches,all branches were burnt life came to an end,unfulfilled desires bearing the brunt.songs dissolved in tears and dreams got buried,after they broke and light from lamps departed clothed in smoke.
And we just waited,bent and broken for the flow of life to ebb,to slacken.
dust was all we saw, when the caravan had passed.
Such beauty! flowers fell in love amazed
Such charm! even the mirror shivered totally dazed.
Be it earth,be it sky; every girl and every guy in one direction they all gazed.
Everything just changed one day, buds were trampled and roads strangled what could we do? beaten by time near the edge..on the brink,but nurse the hangover of last night's drink...................................

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
                   --गोपालदास 'नीरज'