रविवार, 15 अगस्त 2021

इतिहास में शामिल की गई गंभीर गलतबयानियों में सुधार लाया जाएगा

 प्रविष्टि तिथि: 15 AUG 2021 7:34 PM by PIB Delhi

श्री जी किशन रेड्डी ने उठाया का मुद्दा

कहा- देश के इतिहास में शामिल हैं बहुत सी गलतबयानियां 

उन्होंने आजादी के अमृत महोत्सव के भाग के रूप में स्वतंत्रता के 75 वर्षों को चिह्नित करने के लिए एनएमए में आयोजित एक प्रदर्शनी 'विजय एवं शौर्य स्मारक' का उद्घाटन भी किया


नई दिल्ली
:15 अगस्त 2021: (पीआईबी//पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::

राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (एनएमए) द्वारा 'विजय एवं शौर्य स्मारकों' पर आयोजित की गई फोटो प्रदर्शनी के माध्यम से हजारों वर्षों तक हमारी सभ्यता के लोकाचार को उजागर करने की दिशा में प्रयास किए गए।

श्री जी किशन रेड्डी ने देश की कला, संस्कृति और सभ्यता वाले मूल्यों के संदर्भ में जानकारी प्रदान करने के महत्व पर प्रकाश डाला।

संस्कृति राज्य मंत्री, श्री अर्जुन राम मेघवाल और श्रीमती मीनाक्षी लेखी ने भी इस उद्घाटन समारोह में हिस्सा लिया।

इस अवसर पर उपस्थित प्रसिद्ध कवियों के माध्यम से सुनायी गई कविताओं का उपस्थित गणमान्य लोगों ने भरपूर आनंद लिया।

केंद्रीय संस्कृति, पर्यटन और पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास मंत्री (डोनर), श्री जी किशन रेड्डी ने आज नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण में 'विजय एवं शौर्य स्मारक' पर आयोजित की गई एक फोटो प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस अवसर पर संस्कृति राज्य मंत्री, श्री अर्जुन राम मेघवाल और श्रीमती मीनाक्षी लेखी भी उपस्थित हुए। देश की स्वतंत्रता के 75 वर्षों के उपलक्ष्य के अवसर पर मनाए जा रहे 'आजादी के अमृत महोत्सव' के एक हिस्से के रूप में, राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण में 'विजय एवं शौर्य स्मारक' पर एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।

इस उद्घाटन समारोह के दौरान एनएमए, श्री तरुण विजय के साथ संस्कृति मंत्रालय एवं राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के अन्य अधिकारी भी उपस्थित हुए। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (एनएमए) के माध्यम से 'विजय एवं शौर्य स्मारक' की फोटो प्रदर्शनी द्वारा उन लोगों के बारे में जानकारी प्रदान करने की कोशिश की गई, जिन्होंने हजारों वर्षों तक हमारी सभ्यता के लोकाचारों को संभाल कर रखा और हमारे देश में पिछले 750 वर्षों में हुए आक्रमणों और उपनिवेशीकरण के कारण हमारी सभ्यता की रक्षा करने वाले लोगों को भुला दिया गया था। इसके माध्यम से, प्रदर्शनी में सहस्राब्दियों से चलने वाले प्रतिरोधों और वीरता का प्रदर्शन किया गया है। इसमें वारंगल के काकैत्य कला थोरानम की तस्वीरें शामिल की गईं, साथ ही झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का किला, जो कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के युद्ध में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाली उनकी वीरता का प्रतीक है और चित्तौड़गढ़ का विजयस्तंभ जो महमूद खिलजी के नेतृत्व वाली सल्तनत पर जीत की याद को दोहराता है, उनको भी शामिल किया गया।

प्रदर्शनी का संपूर्ण दौरा करने के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए, श्री जी किशन रेड्डी ने कहा कि आज 130 करोड़ देशवासियों के लिए एक बड़ा ही ऐतिहासिक दिन है क्योंकि आज हम आजादी के 74 वर्ष पूरे कर चुके हैं और 75वें वर्ष की ओर बढ़ रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से सरकार द्वारा देश के वास्तविक इतिहास को नागरिकों के सामने लाने की कोशिश की जा रही है और वीरता स्मारकों पर आयोजित किया गया यह प्रदर्शन, उसी लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक मजबूत कदम है। श्री जी किशन रेड्डी ने देश की कला, संस्कृति और सभ्यता वाले मूल्यों की जानकारी के महत्व पर भी प्रकाश डाला और कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्व में संस्कृति मंत्रालय द्वारा इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए काम किया जा रहा है।

श्री जी किशन रेड्डी ने कहा कि "हमारे देश का इतिहास वीरता एवं बहादुरी वाली कहानियों से भरा हुआ है, जिन्होंने या तो दिन का उजाला नहीं देखा है या औपनिवेशिक विचारों के कारण उन्हें पूर्ण रूप से गलत प्रकार से प्रस्तुत किया गया है। हमारे देश के इतिहास में इन गलतबयानियों में सुधार किया जाएगा।"

मंत्री द्वारा यह भी कहा गया कि "जब भारत के अधिकांश इलाकों में 15 अगस्त, 1947 के दिन स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाया जा रहा था, तब निजाम क्षेत्र को 17 सितंबर, 1948 तक यानी 1 वर्ष, 1 महीना और 1 दिन तक इंतजार करना पड़ा था, जब तक इस क्षेत्र को सरदार पटेल द्वारा आजाद नहीं करवाया गया।" उन्होंने कहा कि "निजाम की अराजक सेनाओं द्वारा न सिर्फ गांवों को लूटने और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने का काम किया गया बल्कि राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिश करने वाले लोगों पर गोलियां भी चलाई गई, लेकिन इन बातों को दबा दिया गया और शायद ही कभी इन विषयों पर चर्चा की गई। इन कहानियों को अब प्रकाश में लाया जाएगा।" श्री किशन रेड्डी ने देश के युवाओं से इतिहास में घटित हुई ऐसी घटनाओं के संदर्भ में जानकारी प्राप्त करने के महत्व पर भी बल दिया गया। उन्होंने कहा कि "युवाओं को इतिहास में लोगों द्वारा दी गई उनकी आहुतियों और योगदान के बारे में जानकारी प्राप्त होनी चाहिए।"

श्री किशन रेड्डी ने मीडिया से भी अनुरोध किया कि वे एकता के संदेश के प्रचार-प्रसार के लिए सरकार की पहल एवं प्रधानमंत्री श्री मोदी के विजन को समर्थन प्रदान करें, जैसा कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिए गए अपने भाषण में अभी से लेकर 25 वर्षों तक के लिए एक भारत की परिकल्पना की है। उन्होंने कहा कि जब 2047 में भारत अपनी आजादी के 100 वर्ष पूरे कर रहा होगा तो उसे भ्रष्टाचार से मुक्त एवं संस्कृति, अर्थव्यवस्था के मामले में एक मजबूत देश होना चाहिए।

मंत्री ने सरकारी कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी के महत्व पर भी प्रकाश डाला और कहा कि "सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए लेकिन उनमें लोगों को भी शामिल होना चाहिए।"

संस्कृति राज्य मंत्री, श्री अर्जुन राम मेघवाल ने स्मारकों के संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए, चित्तौड़गढ़ में विजय स्‍तंभ के संरक्षण को बनाए रखने के लिए आवश्यक उपाय करने की ओर इशारा किया। उन्होंने देश में घटित हुई ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में हमारे इतिहास की किताबों और समाचार पत्रों में सही रूप से दर्शाने के महत्व पर भी बल दिया और इसमें शामिल संस्थानों से इस विषय पर ध्यान देने के लिए कहा। उन्होंने महाराणा प्रताप सिंह के साहस और पराक्रम को याद करते हुए कहा कि "शौर्य की कहानियों को उजागर किया जाना चाहिए और उनमें सुधार करने की आवश्यकता है।"

संस्कृति राज्य मंत्री, श्रीमती मीनाक्षी लेखी ने कहा कि लोगों को हमारे देश के संपूर्ण इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त नहीं है। उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि वर्तमान समय में लोगों को दिल्ली के राजा अननपाल और महरौली के महत्व के बारे में बहुत जानकारी प्राप्त नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि देश के इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है और इतिहास के बारे में लोगों को सच्चाई जानने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अमृत महोत्सव के दौरान समुद्र मंथन किए जाने कि आवश्यकता है जिससे सत्य रूपी अमृत की प्राप्ति हो सके।

इस अवसर पर आयोजित किए गए कवि सम्मेलन में प्रसिद्ध कवियों ने अपनी कुछ कविताओं का पाठ भी किया।

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मंगलवार, 27 जुलाई 2021

तीनों सेनाओं के संयुक्त प्रशिक्षण पर जोर दिया

प्रविष्टि तिथि: 27 JUL 2021 7:03PM by PIB Delhi

अंडमान और निकोबार के एयर डिफेन्स को मजबूत करने पर जोर

अंडमान निकोबार कमान के कमांडर-इन-चीफ ने  किया दौरा 

पोर्ट ब्लेयर स्थित वायु सेना कंपोनेट का किया विशेष दौरा 

*अंडमान और निकोबार कमान के कमांडर-इन-चीफ ने ऑपरेशनल तैयारियों की समीक्षा की

*तीनों सेनाओं के संयुक्त प्रशिक्षण पर जोर दिया

*अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के एयर डिफेन्स को मजबूत करने पर जोर दिया

*एयर वारियर्स के असाधारण समर्पण के लिए पुरस्कार देने की बात कही

नई दिल्ली: 27 जुलाई 2021: (पीआईबी//पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::

अंडमान और निकोबार कमान के कमांडर-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल अजय सिंह ने 27 जुलाई, 2021 को परिचालन संबंधी तैयारियों की समीक्षा करने के लिए पोर्ट ब्लेयर में वायु सेना मुख्यालय के कंपोनेंट का दौरा किया। एयर फोर्स कंपोनेंट कमांडर एयर कमोडोर एस श्रीधर ने उनका स्वागत किया। लेफ्टिनेंट जनरल अजय सिंह को मुख्यालय वायु सेना कंपोनेंट के लेआउट और इसके इंफ्रास्ट्रक्चर विकास योजना के बारे में जानकारी दी गई।

लेफ्टिनेंट जनरल अजय सिंह ने वायु योद्धाओं के साथ बातचीत की और तीनों सेवाओं के संयुक्त उपयोग पर अपना दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने तीनों सेवाओं के संयुक्त प्रशिक्षण के महत्व को रेखांकित किया और विरोधियों पर बढ़त के लिए उभरती प्रौद्योगिकियों के साथ तालमेल बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि पेशेवर ज्ञान और कड़ी मेहनत सफलता की कुंजी है।

लेफ्टिनेंट जनरल अजय सिंह ने वायु सेना स्टेशन पर्थरापुर और 153 स्क्वाड्रन का भी दौरा किया, जिन्हें 'द्वीप प्रहरी' के रूप में जाना जाता है। भारतीय वायु सेना कर्मियों के साथ अपनी बातचीत के दौरान, उन्होंने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के एयर डिफेन्स को मजबूत करने पर जोर दिया, जिसका हिंद महासागर क्षेत्र में बदलती भू-राजनीतिक स्थिति के कारण सामरिक महत्व है। उन्होंने कुछ एयर वारियर्स के असाधारण समर्पण और कर्तव्य निर्वहन के लिए मौके पर ही प्रशंसा दी।

लेफ्टिनेंट जनरल अजय सिंह ने वायु विहार, ब्रुकशाबाद में वायु सेना कर्मियों के लिए नवनिर्मित आवासीय क्षेत्र का भी दौरा किया, जहां उन्हें आवासीय क्षेत्र में विकसित विभिन्न कल्याणकारी सुविधाओं के बारे में जानकारी दी गई। उन्होंने सुदूर द्वीपों में विभिन्न चुनौतियों के बावजूद प्रभावी हवाई निगरानी में वायु सेना कंपोनेंट द्वारा किए गए प्रयासों की भी सराहना की।

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बुधवार, 23 जून 2021

मामला भारत श्रम शक्ति भागीदारी में लैंगिक अंतर का

प्रविष्टि तिथि: 23 JUN 2021 5:05 PM by PIB Delhi

लैंगिक अंतर को कम करने का सामूहिक प्रयास जारी--श्रम मंत्री

संतोष गंगवार की जी-20 श्रम और रोजगार मंत्रियों की बैठक में घोषणा 

ईडब्ल्यूजी प्राथमिकताओं पर मंत्रिस्तरीय पर किया विशेष संबोधन  


लुधियाना
: 23 जून 2021: (पीआईबी//पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::

केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री श्री संतोष गंगवार ने कहा है कि भारत श्रम शक्ति भागीदारी में लैंगिक अंतर कम करने के लिए सामूहिक प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि देश शिक्षा, प्रशिक्षण, कुशलता, उद्यमिता विकास और समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित कर रहा है। श्री गंगवार आज यहां जी-20 श्रम और रोजगार मंत्रियों की बैठक में घोषणा और कार्य समूह प्राथमिकताओं पर मंत्रिस्तरीय संबोधन कर रहे थे। श्री गंगवार ने कहा कि मजदूरी पर नई संहिता, 2019 से मजदूरी, भर्ती और रोजगार की शर्तों में लिंग आधारित भेदभाव कम होगा। सभी प्रतिष्ठानों में सभी प्रकार के कार्य के लिए महिलाएं हकदार हैं। नियोक्ताओं को उनकी सुरक्षा और काम के घंटों के प्रावधान सुनिश्चित करने होंगे। महिलाएं अब रात के समय भी काम कर सकती हैं। 

श्री गंगवार ने बताया कि सवैतनिक मातृत्व अवकाश की अवधि 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दी गई है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना में महिला उद्यमियों को छोटे उद्यम शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता दी गई है। इस योजना के तहत 9 हजार बिलियन रुपये के जमानत मुक्त ऋण वितरित किए गए हैं। इस योजना में लगभग 70 प्रतिशत खाते महिलाओं के हैं। 

श्रम और रोजगार मंत्री ने कहा कि सामाजिक सुरक्षा संबंधी नई संहिता में अब स्वरोजगार और कार्य बल के अन्य सभी वर्गों को भी सामाजिक सुरक्षा कवरेज के दायरे में शामिल किया जा सकता है। असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए 2019 में शुरू की गई स्वैच्छिक और अंशदायी पेंशन योजना में 60 वर्ष की आयु के बाद न्यूनतम सुनिश्चित पेंशन का प्रावधान है।

श्रम मंत्री ने संयुक्त मंत्रिस्तरीय घोषणा को अपनाने का समर्थन करते हुए इस बात पर जोर दिया कि सदस्य देशों द्वारा इस तरह की पहल पूरी युवा पीढ़ी के समग्र विकास और क्षमता निर्माण के लिए काफी मददगार साबित होगी, जो तेजी से विकसित हो रही है और अब महामारी के कारण अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है।

रोजगार कार्य समूह ने महिलाओं के रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और दूरदराज के कामकाज सहित प्रमुख मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। बैठक का विषय श्रम बाजारों और समाजों की समावेशी, टिकाऊ और लचीली वसूली को प्रोत्साहन रहा।

वर्ष 2014 में जी-20 के नेताओं ने ब्रिसबेन में श्रम शक्ति भागीदारी दरों में पुरुषों और महिलाओं के बीच के अंतर को 2025 तक 25 प्रतिशत कम करने का संकल्प किया था। यह संकल्प श्रम बाजार में 100 मिलियन महिलाओं को लाने, वैश्विक और समावेशी विकास को बढ़ाने तथा गरीबी और असमानता को कम करने के उद्देश्य के साथ व्यक्त किया गया था। हाल के वर्षों में लगभग सभी जी-20 देशों ने समान अवसरों, श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी और लैंगिक वेतन अंतर को कम करने के मामले में प्रगति की है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कोविड-19 महामारी के प्रभाव के कारण लैंगिक असमानताओं को कम करने की प्रक्रिया धीमी हो गई है। जी-20 देशों द्वारा लागू किए गए उपायों से रोजगार और कोविड-19 के सामाजिक प्रभाव को कम करने में मदद मिली। फिर भी कई देशों के साक्ष्य महिलाओं पर असंगत प्रभाव दिखाते हैं। श्रम बाजारों और समाजों में लैंगिक असमानता बढ़ने के जोखिम को स्वीकार करते हुए रियाद शिखर सम्मेलन में जी-20 नेताओं ने महिलाओं के रोजगार की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ ब्रिस्बेन लक्ष्य को हासिल करने के लिए रोडमैप तैयार करने का आह्वान किया था।

इस आह्वान के उत्तर में ब्रिस्बेन लक्ष्य की ओर और उससे आगे के जी-20 रोडमैप को हमारे श्रम बाजारों के साथ-साथ सामान्य रूप से समाजों में महिलाओं और पुरुषों के लिए समान अवसर और परिणाम प्राप्त करने के लिए विकसित किया गया है। यह रोडमैप महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने, रोजगार और लैंगिक समानता की गुणवत्ता (ऑस्ट्रेलिया, 2014) और श्रम शक्ति भागीदारी में लैंगिक अंतर कम करने की जी-20 नीति सिफारिशों तथा महिलाओं की रोजगार गुणवत्ता में सुधार करके वेतन (जर्मनी 2017) के लिए जी-20 नीति प्राथमिकताओं पर आधारित है।

श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी और उनके रोजगार की गुणवत्ता में सुधार में अनेक कारक बाधक बने हुए हैं। इन बाधाओं पर काबू पाना न केवल ब्रिस्बेन लक्ष्य और सदस्य देशों की पिछली प्रतिबद्धताओं को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि श्रम बाजार और समाजों में पूर्ण लैंगिक समानता पर भी लक्ष्य साधना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नीतिगत उपायों को व्यवहारवादी अंतर्दृष्टि द्वारा, आंकड़ों और साक्ष्यों के आधार पर सूचित किया जाए और राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार अनुकूल बनाया जाए। इस पृष्ठभूमि में ब्रिस्बेन लक्ष्य की ओर और उससे आगे का रोडमैप महिलाओं के रोजगार की मात्रा और गुणवत्ता बढ़ाने, समान अवसर सुनिश्चित करने तथा श्रम बाजार में बेहतर परिणाम प्राप्त करने, सभी क्षेत्रों और व्यवसायों में महिलाओं और पुरुषों के समान वितरण को प्रोत्साहित करने, लैंगिक वेतन अंतर से निपटने, महिलाओं तथा पुरुषों के बीच भुगतान और अवैतनिक काम के अधिक संतुलित वितरण को प्रोत्साहित करने और श्रम बाजार में भेदभाव और लैंगिक रुढ़िबद्धता के समाधान के रूप में तय किया गया है।

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सोमवार, 21 जून 2021

पूरे भारत में 75 विरासत स्थलों पर आयोजित हुए योग कार्यक्रम

 21-जून-2021 13:04 IST

'योग, एक भारतीय विरासत' के अंतर्गत चला विशेष अभियान 

श्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने युवाओं से स्वस्थ और खुशहाल भविष्य के लिए योग को अपनाने का आग्रह किया


नई दिल्ली
: 21 जून 2021: (पीआईबी//पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::

संस्कृति और पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)श्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने आज सातवें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले में संस्कृति और पर्यटन मंत्रालयों के अधिकारियों,योग विशेषज्ञों और योग प्रशंसकों के साथ योग किया। केंद्रीय मंत्री "योग, एक भारतीय विरासत" अभियान का नेतृत्व कर रहे थे। यह कार्यक्रम 75 सांस्कृतिक विरासत स्थलों पर आयोजित किया गया था, जिसमें स्वतंत्रता के 75 वर्ष मनाने के उपलक्ष्य में मंत्रालय के सभी संस्थानों/निकायों की सक्रिय भागीदारी थी। वर्तमान महामारी की स्थिति को देखते हुएयोग के लिए भाग लेने वालों की संख्या प्रत्येक स्थल पर 20 तक सीमित थी। योग प्रदर्शन से पहले केंद्रीय मंत्री और कार्यक्रम में शामिल लोगों ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन का सीधा प्रसारण देखा।

लाल किले पर योग समारोह के बाद पत्रकारों से बातचीत में श्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने कहा कि योग हमारी सबसे बड़ी धरोहर है। इसका श्रेय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को जाता है कि उन्होंने इस आरोग्य मंत्र को पूरी दुनिया में लोकप्रिय बनायाहै। परिणामस्वरूप आज पूरा विश्व अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाता है और लोगों ने इसे अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया है।उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अमृत महोत्सव के तहत अंतर्राष्ट्रीययोग दिवस 2021 मनाया जा रहा है। इसी के अनुसार संस्कृति मंत्रालय ने देश भर में 75 विरासत स्थलों पर योग कार्यक्रम आयोजित किए हैं। उन्होंने युवाओं से स्वस्थ और खुशहाल भविष्य का आनंद लेने के लिए अपने जीवन में योग को अपनाने का आग्रह किया।

श्री पटेल ने कहा कि प्रधानमंत्री ने घोषणा की है कि आज दुनिया को एमयोग ऐप मिल रहा है, जिसमें कई भाषाओं में सामान्य योग प्रोटोकॉल पर आधारित योग प्रशिक्षण के अनेक वीडियो उपलब्ध होंगे। उन्होंने कहा कि एमयोग ऐप निश्चित रूप से विश्व के सभी लोगों को स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने में सहायक होगा।

आचार्य प्रतिष्ठा के मार्गदर्शन में लाल किले पर योग प्रोटोकॉल प्रदर्शन किया गया। भारत सरकार के सचिव (संस्कृति) श्री राघवेन्द्र सिंह, भारत सरकार के सचिव (पर्यटन) श्री अरविंद सिंह और मंत्रालय के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी इस योग अभियान में शामिल हुए।

संस्कृति मंत्रालय ने एलोरा गुफा (औरंगाबाद), नालंदा (बिहार), साबरमती आश्रम (गुजरात), हम्पी (कर्नाटक), लद्दाख शांति स्तूप (लेह), सांची स्तूप (विदिशा), शीश महल (पटियाला), राजीव लोचन मंदिर (छत्तीसगढ़), बोमडिला (अरुणाचल प्रदेश) जैसे विरासत स्थलों पर योग और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए।

शीश महल, पटियाला के योग कैंप का दृश्य देखने वाला था। शाही शहर में योग का जलवा भी अलग सी छटा बिखेर रहा था। कभी किसी ज़माने में क्रिकेट को भारतीय आसमान पर ले जाने वाला पटियाला अब भारतीय योग को बुलंदियों पर लेजाने में योगदान दे रहा था। 

वारंगल के वारंगल किला में लगा योग शिविर भी कमाल का रहा। कभी नक्सलवाद का गढ़ रहे वारंगल में योग की शांति एक नया इतिहास रच रही थी। अंतर्मन की कलह और बेचैनी के आतंक को नियंत्रित करने के भी अशोक उपाय बता रहा था आज का योग शिविर।  

एलोरा गुफा,एलोरा,औरंगाबाद में पहले पहल केवल गुफाओं का नाम था। ये गुफाएं भी गहरे योग के बिना कुछ समझा पाने में सफल नहीं रहती। इन गुफाओं में बनी ,मूर्तियां क्या संदेश देती हैं इसे गहरे योग के ध्यान से ही समझा जा सकता है। ाजका का योग शिविर इस मकसद से भी सफलता पूर्वक ज्ञान दे रहा था। 

गंगईकोंडा चोलापुरम, बोमडिला(अरुणाचल प्रदेश), राजीव लोचन मंदिर,छत्तीसगढ़ और हम्पी सर्किल में लगे योग शिविर भी पूरी तरह सफल रहे। 

रविवार, 21 मार्च 2021

क्या धर्मनिरपेक्षता भारत की परंपराओं के लिए खतरा है?

Sunday: 21st  March 2021 at 10:40 AM

 17 मार्च, 2021//राम पुनियानी


नई दिल्ली
//भोपाल: 21st March 2021: (राम पुनियानी//पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::

Pexels Photo by Lucky Trips

भारत को एक लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश राज से मुक्ति मिली. यह संघर्ष समावेशी और बहुवादी था. जिस संविधान को आजादी के बाद हमने अपनाया, उसका आधार थे स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय के वैश्विक मूल्य. धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधान की मूल आत्मा है और इसके संदर्भ में अनुच्छेद 14, 19, 22 और 25 में प्रावधान किए गए हैं. हमारा संविधान देश के सभी नागरिकों को अपने धर्म में आस्था रखने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने की अबाध स्वतंत्रता देता है.

जब हम स्वाधीन हुए तब भी देश का संपूर्ण नेतृत्व विविधता का सम्मान करने वाले बहुवादी मूल्यों का हामी नहीं था. साम्प्रदायिक तत्वों ने संविधान लागू होते ही उस पर तीखा हमला बोला. उनका कहना था कि हमारा संविधान भारत के गौरवशाली अतीत और उसके मूल्यों को प्रतिबिंबित नहीं करता. ये मूल्य वे थे जो मनुस्मृति जैसे ग्रंथों में व्याख्यायित किए गए थे. साम्प्रदायिक तत्वों को हमारा संविधान ही नहीं बल्कि देश का तिरंगा झंडा भी पसंद नहीं था. आज स्वाधीनता के सात दशक बाद वे ही तत्व एक बार फिर अपना सिर उठा रहे हैं. ये वही लोग हैं जिन्होंने भारतीय संविधान और उसमें निहित मूल्यों का विरोध किया था.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसे शीर्ष नेता एक ओर तो कहते हैं कि वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं. दूसरी ओर चुनावी गणित को ध्यान में रखते हुए वे यह भी कहते हैं कि, "हम धर्मनिरपेक्ष हैं - इसलिए नहीं क्योंकि हमारे संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ा गया है, बल्कि इसलिए क्योंकि धर्मनिरपेक्षता हमारे खून में है. हम वसुधैव कुटुम्कम् के आदर्श में विश्वास रखते हैं."

दूसरे छोर पर योगी आदित्यनाथ जैसे नेता हैं जो धर्मनिरपेक्षता की परिकल्पना के प्रति अपनी वितृष्णा को छिपाने का तनिक भी प्रयास नहीं करते हैं. उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने हाल में कहा कि धर्मनिरपेक्षता हमारे देश की परंपराओं को विश्व मंच पर मान्यता मिलने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है. पूर्व में एक अन्य मौके पर उन्होंने कहा था कि 'सेक्युलर' शब्द सबसे बड़ा झूठ है और यह मांग की थी कि जिन लोगों ने इस झूठ का प्रचार-प्रसार किया है उन्हें माफी मांगनी चाहिए. उनका आशय कांग्रेस से था.

आदित्यनाथ ने विधायक और फिर मंत्री के तौर पर भारतीय संविधान के नाम पर शपथ ली है. इसके बाद भी उन्हें इस संविधान के मूलभूत मूल्यों को नकारने में कोई संकोच नहीं होता. वे गोरखनाथ मठ के महंत हैं और अपनी पार्टी के कुछ अन्य नेताओं की तरह हमेशा भगवा वस्त्रों में रहते हैं.

आईए हम देखें कि धर्मनिरपेक्षता भला किस तरह भारतीय परंपराओं के लिए खतरा है. भारत हमेशा से एक बहुवादी देश रहा है. यहां धार्मिक परंपराओं, भाषाओं, नस्लों, खानपान की आदतों, वेशभूषा, पूजा पद्धतियों आदि में समृद्ध विविधता है. जिस हिन्दू धर्म के नाम पर योगी आदित्यनाथ धर्मनिरपेक्षता पर निशाना साध रहे हैं वह स्वयं विविधताओं से परिपूर्ण है. हिन्दू धर्म में ऊँच-नीच पर आधारित ब्राम्हणवादी परंपराएं हैं तो समतावादी भक्ति परंपरा भी है. क्या यह विविधता वैश्विक मंच पर भारत को स्वीकार्यता और मान्यता दिलवाने में बाधक बनी है?

दुनिया के विकास में भारत के योगदान को कहां स्वीकृति नहीं मिली? दुनिया का एक बड़ा हिस्सा बुद्ध के दर्शन से प्रभावित है. स्वाधीनता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी विश्व पटल पर एक महामानव की तरह उभरे और उन्होंने पूरी दुनिया को भारतीय परंपरा पर आधारित अहिंसा और सत्याग्रह के मूल्यों का अमूल्य उपहार दिया. उनके विचारों ने दुनिया के अनेक शीर्ष नेताओं को प्रभावित किया जिनमें मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला शामिल थे. इन दोनों नेताओं ने महात्मा गांधी की विचारधारा को अपने संघर्ष का आधार बनाया. भारतीय दर्शन और विचारों ने अन्य अनेक तरीकों से पूरी दुनिया को प्रभावित किया.

वैसे हमें यह भी समझना होगा कि पूरी दुनिया में अलग-अलग संस्कृतियां हैं और वे सब एक-दूसरे से अपने विचार, ज्ञान और दर्शन को सांझा करती आई हैं. भारत ने गणित और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में जो उपलब्धियां हासिल कीं वे आज वैश्विक ज्ञान संपदा का हिस्सा हैं. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पूरी दुनिया को गुटनिरपेक्षता की अनूठी परिकल्पना दी जिसे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के कई राष्ट्रों ने स्वीकार किया और अपनाया.

आदित्यनाथ जो कह रहे हैं उसके ठीक विपरीत सच यह है कि धर्मनिरपेक्षता का पथ अपनाने के कारण ही भारतीय गणतंत्र अपने शुरूआती पांच-छःह दशकों में औद्योगिकरण, शिक्षा, सिंचाई, परमाणु ऊर्जा व अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में चमत्कारिक प्रगति कर सका. पिछले कुछ दशकों में धर्मनिरपेक्षता के कमजोर पड़ते जाने के साथ ही हमारी प्रगति की गति भी थम गई. अब तो हमारा सत्ताधारी दल इस बात की खुशियां मना रहा है कि पिछले चुनाव में किसी भी पार्टी की 'धर्मनिरपेक्षता' शब्द का इस्तेमाल करने तक  की हिम्मत नहीं हुई.

यह भी कहा जाता है कि धर्मनिरपेक्षता शब्द को सन् 1976 में अकारण हमारे संविधान का हिस्सा बनाया गया था और इसलिए उसे संविधान से हटा दिया जाना चाहिए. सच तो यह है कि हमारे संविधान की रग-रग में धर्मनिरपेक्षता समाई है और इसे कोई हटा नहीं सकता. धर्मनिरपेक्षता का एक अर्थ तो यह है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होगा. इसका दूसरा अर्थ यह है कि राज्य सभी धर्मों का सम्मान करेगा परंतु कोई धर्म उसका मार्गदर्शक नहीं होगा. धर्मनिरपेक्षता का तीसरा पक्ष यह है कि धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों को पूरा सम्मान और सुरक्षा दी जाएगी और उनके विकास और कल्याण के लिए राज्य सकारात्मक भेदभाव कर सकेगा. इस सकारात्मक भेदभाव को आज मुसलमानों का तुष्टिकरण बताया जा रहा है और इसके नाम पर बहुसंख्यक समुदाय को गोलबंद करने के प्रयास हो रहे हैं.    

आदित्यनाथ धर्मनिरपेक्षता, बहुवाद और विविधिता के मूल्यों के विरोधी हैं. वे हिन्दू राष्ट्र के समर्थक हैं. ऐसी सोच रखने वाले वे अपनी पार्टी के एकमात्र सदस्य नहीं हैं. बल्कि शायद उनकी तरह सोचने वालों का उनकी पार्टी में बहुमत है. केन्द्रीय मंत्री अनंत हेगड़े ने खुलकर कहा था कि भाजपा संविधान को बदलना चाहती है. पूर्व सरसंघचालक के. सुदर्शन का कहना था कि भारतीय संविधान पश्चिमी मूल्यों पर आधारित है और हमारे देश के लिए उपयुक्त नहीं है. उनके अनुसार भारत को अपने पवित्र ग्रंथों पर आधारित एक नया संविधान बनाना चाहिए.

पूरी दुनिया में धार्मिक राष्ट्रवादी धर्मनिरेक्ष-बहुवादी मूल्यों के विरोधी होते हैं क्योंकि ये मूल्य उन्हें मनमानी नहीं करने देते. इनके चलते वे अपने मूल्यों और अपनी सोच को पूरे समाज पर लाद नहीं पाते. वे ऊँचनीच पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का निर्माण नहीं कर पाते - उस सामाजिक व्यवस्था का जिसकी पैरवी मनुस्मृति जैसी पुस्तकें करती हैं. चाहे वे हिन्दू राष्ट्रवादी हों या तालिबानी, चाहे वह मुस्लिम ब्रदरहुड हो या श्रीलंका और म्यामांर में बौद्ध धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले. इन सभी का आदर्श है वर्ग, नस्ल, धर्म, जाति, लिंग आदि पर आधारित पूर्व-आधुनिक व्यवस्था, जिसमें हर व्यक्ति का स्थान उसके जन्म से निर्धारित होता हो. अर्थात कौन किसके ऊपर होगा और कौन किसके नीचे यह सब पहले से तय होता है.

पाकिस्तान में साम्प्रदायिक तत्वों का बोलबाला रहा है. हम सब यह देख सकते हैं कि उस देश के क्या हाल बने हैं. न तो इस्लाम उसे एक रख सका और ना ही वह विज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगिकरण आदि किसी भी क्षेत्र में प्रगति कर सका है.

अगर हमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पोषण के क्षेत्रों में उन्नति करनी है तो हमें साम्प्रदायिक सोच से मुक्ति पानी ही होगी. अन्यथा हम केवल मंदिर-मस्जिद के झगड़ों और राज्य के व्यय पर धार्मिक त्यौहार मनाने में अपना समय और ऊर्जा व्यय करते रहेंगे. (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

गुरुवार, 18 मार्च 2021

कोविड ने बच्चों और महिलाओं के जीवन में भी की है भयानक तबाही

दक्षिण एशिया: महामारी के कारण जच्चा-बच्चा मौतों में तीव्र बढ़ोत्तरी


17 मार्च 2021//महिलाएं

आपदा कहीं भी आये उसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ता है महिलाओं पर। इसके साथ ही  बच्चों की। आज  युग की खबरें भी कुछ इसी तरह की आ रही हैं। कोविड  तबाही की दर वाली है। संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों ने कहा है कि दक्षिण एशिया में, कोविड-19 के कारण, स्वास्थ्य सेवाओं में उत्पन्न हुए गम्भीर व्यवधान के परिणामस्वरूप, वर्ष 2020 के दौरान, जच्चा-बच्चा की अतिरिक्त दो लाख 39 हज़ार मौतें हुई हैं। यह आंकड़ा सचमुच चिंतित करने वाला है। संयुक्त राष्ट्र समाचार की टीम के सदस्य इसकी विस्तृत तस्वीर सामने लाये हैं और यह तस्वीर बेहद दुखद है। बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है। 

UNICEF/Omid Fazel: अफ़ग़ानिस्तान के हेरात प्रान्त में, आन्तरिक विस्थापितों के लिये बनाए गए एक शिविर में, सामुदायिक शिक्षा केन्द्र में कुछ बच्चे

यह तस्वीर डराने वाली है। पूरे समाज को जागना होगा और सक्रिय भूमिका।  संयुक्त राष्ट्र बाल कोष–यूनीसेफ़, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) ने द्वारा बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस व्यवधान के परिणामस्वरूप, गम्भीर व तात्कालिक कुपोषण का इलाज पाने वालों, व बचपन में टीकाकरण किये जाने वाले बच्चों की संख्या में भी काफ़ी कमी हुई है।  इस तरह न जाने कितने बच्चे और कितने परिवार आवश्यक सेवा और सुविधा से वंचित रह रहे हैं। 

UNICEF-WHO-UNFPA report: दक्षिण एशिया में, बच्चों और माताओं पर कोविड-19 महामारी के प्रभाव की एक झलक


पूरे विश्व के जागरूक लोग इस समस्या को ले कर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं। दक्षिण एशिया के लिये यूनीसेफ़ के क्षेत्रीय निदेशक ज्यॉर्ज लरयी-ऐडजेई के अनुसार इन महत्वपूर्ण व आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं में व्यवधान उत्पन्न होने के कारण, निर्धनतम व बहुत कमज़ोर हालात का सामना कर रहे परिवारों के स्वास्थ्य व पोषण पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है। इस वक्तव्य से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस विनाशकारी प्रभाव के दुष्परिणाम निकट भविष्य में भी दिखाई देंगें और साथ ही देर तक इनकी आहत करने वाली आहट सुनाई देती रहेगी। 

क्षेत्रीय निदेशक ज्यॉर्ज लरयी-ऐडजेई ने ज़ोर देकर कहा, “इन स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह बहाल किया जाना बेहद आवश्यक है ताकि उन बच्चों व माताओं को इनका लाभ मिल सके, जिन्हें इनकी बेहद ज़रूरत है।"

"साथ ही, वो सब कुछ किया जाना सुनिश्चित करना होगा जिसके ज़रिये, लोग इन सेवाओं का इस्तेमाल करने में सुरक्षित महसूस करें।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस महामारी के कारण, दक्षिण एशिया क्षेत्र में भी बेरोज़गारी, निर्धनता और खाद्य असुरक्षा में बढ़ोत्तरी हुई है, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में भी गिरावट आई है। 

स्कूल वापसी की सम्भावना कम

महामारी की विकरालता का प्रभाव शिक्षा पर भी पड़ा है। इस रिपोर्ट में अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका के हालात का जायज़ा लिया गया है। पाया गया है कि महामारी और उससे निपटने के लिये लागू किये गए उपायों के कारण, इन देशों में लगभग 42 करोड़ बच्चे स्कूलों से बाहर रह गए। करोड़ों बच्चों की शिक्षा से दूरी  निर्माण करेगी इसका अनुमान भी लगाया जा सकता है। 

इस संबंध में सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी सम्भावना है कि लगभग 45 लाख लड़कियाँ, अब कभी भी स्कूली शिक्षा में वापिस नहीं लौट पाएंगी। इसके अलावा, ये लडकियाँ, यौन व प्रजनन स्वास्थ्य और सूचना प्रदान करने वाली सेवाओं तक पहुँच नहीं होने के कारण, जोखिम के दायरे में हैं। इस जोखिम का परिणाम  भुगतना पड़ सकता है। कोविड का कहर 

एशिया-प्रशान्त के लिये, यूएन जनसंख्या कोष के क्षेत्रीय निदेशक ब्यॉर्न एण्डर्सन का कहना है, “दक्षिण एशिया में सांस्कृतिक व सामाजिक परिदृश्य को देखते हुए, इन सेवाओं में व्यवधान आने से, विषमताएँ और ज़्यादा गहरी हो रही हैं और इसके परिणामस्वरूप, जच्चा-बच्चा की मृत्यु दर में और भी बढ़ोत्तरी होने की सम्भावना है।”

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

सैलमन मछलियों को बचाने के अभियान में जुटी नीरिया अलीसिया गार्सिया

 संघर्ष और विस्थापन से भरी है सैल्मन की ज़िंदगी  

Niria Alicia Garcia coordinates the annual Run 4 Salmon event alongside a community of indigenous activists. Photo: UNEP

19 जनवरी 2021//जलवायु परिवर्तन

शायद हर जीव को लगता हो कि शायद वही है मुश्किलों ने जिसका पीछा शुरू कर दिया। कदम कदम पर इम्तिहान हैं। हर मोड़ पर संग्राम है। मानव वर्ग के भी शायद बहु संख्यक लोगों को भी यही लगता है दुःख और शायद उसी की ज़िंदगी में हैं। वह कभी किस्मत को कोसता है और कभी भगवान को। लेकिन वास्तव में संग्राम और संघर्ष के बिना ज़िंदगी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। कभी भूख के साथ संघर्ष और कभी मौत का सामना। कभी बीमारी मुसीबत कभी वृद्धावस्था।  

ध्यान से देखें तो यह सिलसिला हर किसी के साथ है। यही कुछ होता  मछलियों के साथ। सैल्मोनिडे परिवार की विभिन्न प्रजातियों की मछली के लिए दिया जाने वाला एक आम नाम है सैल्मन। सुनने में काफी अच्छा भी लगता है। इस परिवार की कई अन्य मछलियों को ट्राउट भी कहा जाता है। दोनों के बीच बहुत बसे फर्क भी हैं लेकिन फिर भी प्रजाति तो एक ही है। अक्सर यह अंतर बताया जाता है कि सैल्मन विस्थापित होती रहती हैं और ट्राउट एक तरह से स्थायी निवासी होती हैं। एक ऐसी धारणा जो सैल्मो जीनस के लिए सच है। सैल्मन दोनों जगह रहती है, अटलांटिक में (एक प्रवासी प्रजाति सैल्मो सालार) और प्रशांत महासागर में, साथ ही साथ ग्रेट लेक्स में ओंकोरिन्कस जीनस की करीब एक दर्जन प्रजातियां हैं। थोड़े बहुत अंतर हर प्रजाति में हैं। बहुत सी खूबियां हैं। 

आज हम आपको इस विषय पर बता रहे हैं काफी कुछ लेकिन मुख्य फोकस रहेगा सैल्मन पर जिसके अस्तित्व को शायद अब खतरा पैदा हो गया है। आमतौर पर, सैल्मन ऐनाड्रोमस हैं, वे ताज़े पानी में पैदा होती हैं और फिर जल्दी ही सागर में विस्थापित हो जाती हैं। दिलचस्प बात है कि प्रजनन के लिए सैल्मन मछलियां फिर ताजे पानी में वापस आ जाती हैं। गौरतलब है कि ऐसी दुर्लभ प्रजातियां भी हैं जो केवल ताज़े पानी में ही जीवित रह सकती हैं। लोककथाओं में ऐसा कहा जाता है, कि मछली अंडे देने के लिए ठीक उसी जगह लौटती है जहां वह पैदा हुई थी; ट्रैकिंग अध्ययन से पता चला है कि यह सच है लेकिन इस स्मृति के काम करने की प्रकृति पर लंबी बहस होती रही है। फिर भी यह बता एक ठोस सत्य है। एक बहुत ही आश्चर्यजनक हकीकत है यह तथ्य। 

उल्लेखनीय है कि सैल्मन के अंडे मीठे पानी की धाराओं में आम तौर पर उच्च अक्षांश पर दिए जाते हैं। सेने की प्रक्रिया में अंडे अलेविन या साक फ्राई बन जाते हैं। खड़ी धारियों के छलावरण के साथ फ्राई जल्दी ही, पार में विकसित हो जाते हैं। पार छः महीने से तीन वर्ष तक अपनी देशी धारा में रहती है जिसके बाद वह स्मोल्ट बन जाती है, जिसे उनके चमकदार चांदी जैसे रंग से पहचाना जाता है और जो आसानी से मिट जाता है। यह अनुमान है कि सैल्मन के सभी अण्डों में केवल 10% इस स्तर तक जीवित रहते हैं। स्मोल्ट के शरीर के रसायन विज्ञान में परिवर्तन होता रहता है, जो उन्हें खारे पानी में रहने की अनुमति देता है। स्मोल्ट अपने प्रवास के बाहर का समय खारे पानी में बिताती हैं जहां उनका शारीरिक रसायन शास्त्र समुद्र में ऑस्मोरेग्युलेशन का आदी हो जाता है। जन्म के साथ ही कितना संघर्ष सामने आता है इसका अनुमान आप जन्म की इस बेहद कठिन प्रक्रिया से लगा ही सकते हैं। 

सैल्मन खुले सागर में एक से पांच साल (प्रजातियों के आधार पर) का समय बिताती हैं और जहां वे यौन रूप से पूरी तरह परिपकव भी हो जाती हैं। वयस्क सैल्मन अंडे देने के लिए मुख्यतः अपनी जन्म धारा में लौटती है। अलास्का में, दूसरी धाराओं में जाने से सैल्मन की आबादी दूसरी धाराओं में भी बढ़ती है, जैसे कि वे जो ग्लेशियर वापसी के रूप में आती हैं। सैल्मन अपना मार्गनिर्देशन कैसे करती हैं इसकी सटीक विधि को अभी स्थापित नहीं किया जा सका है, हालांकि गंध की उनकी गहरी समझ इसमें शामिल है। अटलांटिक सैल्मन एक से चार साल तक समुद्र में रहती हैं। (जब एक मछली सिर्फ एक साल में समुद्र में रह कर लौट आती है तो उसे ब्रिटेन और आयरलैंड में ग्रिलसे कहते हैं।) अंडा देने से पहले, प्रजातियों के आधार पर, सैल्मन परिवर्तन से गुजरती है। उनका कूबड़ निकल सकता है, कैनाइन दांत आ सकते हैं, काइप का विकास हो सकता है (नर सैल्मन में जबड़े की स्पष्ट वक्रता). सभी कुछ बदल जाता है, समुद्र की एक चमकदार नीली मछली से एक गहरे रंग में परिवर्तन. सैल्मन अद्भुत सफर करती है, कभी-कभी मजबूत धाराओं के खिलाफ सैकड़ों मील चलती है और जनन के लिए वापस आती है। 

आप अनुमान लगा सकते हैं कि जन्म से लेकर वृद्धावस्था तक संघर्ष ही संघर्ष है। मानव की तरह इन मछलियों को भी इसधर उधर आना जाना पड़ता है। हमारी भाषा में शायद इसे भटकना भी कहा जाता है। भटकनों से भरे जीवन को जीती सैल्मन का जीवन शायद खतरों से भर गया है। इस खतरे के साथ ही उसे चाहने वाले भी आगे आए हैं। इस समंध में हम एक युवती की तस्वीर भी यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं। इस युवती की तस्वीर और इसके बचाव कार्य के विवरण को जनता के सामने लाने की पहल का प्रयास किया है संयुक्त राष्ट्र संघ ने।  

अमेरिका की एक युवती को संयुक्त राष्ट्र ने युवा पृथ्वी चैम्पियन के रूप में सराहा है, जो वर्चुअल रियलिटी की मदद से सैलमन मछलियों को बचाने के अभियान में लगी हैं। 

नीरिया अलीसिया गार्सिया स्थानीय कार्यकर्ताओं के समुदाय के साथ मिलकर वार्षिक ‘रन4सैलमन’ अभियान का समन्वय करती हैं. इस अभियान के तहत वो कैलिफोर्निया के सबसे बड़े जल क्षेत्र में सैक्रामेंटो चिनुक सैलमन मछली की ऐतिहासिक यात्रा को जीवन्त करने के लिये वर्चुअल रियलिटी का उपयोग करते हुए,इस अमूल्य पारिस्थितिकी तंत्र के बारे में जागरूकता बढ़ाती हैं। 

नीरिया अलीसिया संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)के यंग चैम्पियंस ऑफ़ द अर्थ, 2020 के रूप में पहचान बनाने वाले सात नवप्रवर्तकों में से एक हैं। 

इस मछली को खाने और  खाने की सिफारिश करने वाले बताते हैं कि इस मछली में बहुत से पोषक तत्व होते हैं। आँखों के लिए भी यह बहुत फायदेमंद है और हड्डियों लिए। भी। बॉडीबिल्डिंग के लिए भी  इसे काफी अच्छा माना जाता है। रक्तचाप में भी यह काफी फायदेमंद है। 

इसके कुछ नुक्सान भी बताये जाते जाते हैं। तलाबों  में पाली जानेवाली मछलियां बड़े समुन्द्रों में पाली जाने  मछलियों  होने लगती हैं। तालाबों की मछलियों में पारे मात्रा बढ़ जाती है।