Thursday, November 14, 2013

जहाँ इक खिलौना हैं, इन्सां की हस्ती

          यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती 
--सोनू यादव का अंतिम संस्कार
 
बाल दिवस अर्थात  चाचा नेहरू का जन्म दिन। स्व्तंत्रता के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री का जन्म दिन। ख़ुशी का दिन। उत्साह का दिन। बच्चों से नए वायदे करने का दिन और पुराने वायदे पूरे करने का दिन। लेकिन
इस दिन से एक दिन पूर्व रोज़ी रोटी के दुःख में अपना घर परिवार छोड़ कर लुधियाना में आया सोनू यादव इसी शहर के एक श्मशान घाट में हमेशां के लिए आग में राख हो गया।  न उसके जीवन काल में ही उसे कोई सुख मिला था और न ही उसके मरने के बाद उसके परिवार को कोई दिलासा देने आया। राजनीतिक दलों, समाजिक संगठनों और ट्रेड यूनियनों से भरे हुए इस शहर में कोई उसका हाल पूछने नहीं आया। गौरतलब है कि रविवार दस नवंबर 2013 को उसके फेक्ट्री मालिक ने उसे पीट पीट कर मार डाला था।  पुलिस ने दफा 302/34 आईपीसी के अंतर्गत मामला भी दर्ज किया, एक दिन की देरी से अख़बारों में खबरें भी छपीं लेकिन सोनू का अंतिम संस्कार करते समय या तो उसका परिवार था या फिर उसके मज़दूर साथी। अंतिम संस्कार देर शाम को अँधेरा होने पर हुआ शायद उस वक़त सूर्य भी अस्त हो चुका था। याद आ रही है जनाब साहिर लुधियानवी साहिब की पंक्तियाँ:
जहाँ इक खिलौना हैं, इन्सां की हस्ती
ये बस्ती हैं मुर्दा परस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती 
ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या हैं.....---!

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