सोमवार, 21 दिसंबर 2020

किसने सामने रखी हैं दोनों कौमों की सबसे बदसूरत तस्वीरें

 Monday: 21st December 2020 at 02:18 PM

श्याम मीरा सिंह बहुत खूबसूरत अंदाज़ में कर रहे हैं खुलासा


दिल्ली से हैदराबाद के सफर में हूं. वेटिंग लिस्ट की वजह से टिकट कैंसिल हो गई थी तो सीट नहीं मिली। दिल्ली से हैदराबाद के बीच 1680 किमी का रास्ता है, घण्टों में नापें तो 27 से 28 घन्टें। एक आदमी के लिए इतनी देर खड़े रहना मुश्किल है। बैठना भी। मैं स्लीपर क्लास की दस नंबर की बोगी में चढ़ गया। थोड़ा सकुचाने वाला स्वभाव है तो किसी की भी सीट पर नहीं बैठा, खड़ा ही रहा। एक शख्स जिसकी नजर बार-बार मुझपर पड़ रही थी ने मुझे अपनी सीट ऑफर की। मेरा नाम नहीं पूछा, मजहब भी नहीं। बातचीत के दौरान पता चला कि वह बंगलौर (कर्नाटक) जा रहे हैं।

इस बार श्याम मीरा सिंह के संस्मरण 
मैंने भी बताया कि मेरे पास 900 रुपए की टिकट है लेकिन सीट नहीं है, तो मुझे टोकते हुए उसने कहा कि "ये सीट है तो सही आप इसपर ही मेरे साथ सो जाना।" आगे उसने कहा लेकिन एक छोटी सी समस्या होगी कि मेरे अब्बू जोकि हार्ट के पेशेंट हैं वह भी नागपुर स्टेशन से साथ में होने वाले हैं उनकी भी सीट कन्फर्म नहीं हुई है। इसलिए उनके आने के बाद कुछ एडजस्टमेंट करना पड़ेगा।

मतलब कुछ-कुछ ईशारा यही कुछ था कि सीट छोड़नी पड़ेगी। रास्ते भर उसने मुझे खाने-पीने के सभी सामानों में बराबरी पर रखा। पानी, बिस्कुट, संतरें, काजू मठरी, लंच। सबमें आधा-आधा। सफर लम्बा था सीट छोटी। समस्या स्वभाविक रूप से उसे हुई ही होगी। लेकिन उसने एडजस्ट किया। करीब 16 घन्टे के सफर के बाद नागपुर स्टेशन भी आ ही गया। अब्बू चूंकि हर्ट के पेशेंट और उमर में बुजुर्ग थे,उनकी व्यवस्था करना पहली प्राथमिकता थी। मैंने समय की नजाकत को समझते हुए खुद को उस सीट से अलग करना जरूरी समझा और इधर उधर खड़ा होने लगा। एक चादर नुमा बिस्तर अगल-बगल की सीटों के ठीक बीच वाली जमीन पर लगा लिया गया। मैं वहां से कहीं और जाने के लिए अपना बैग संभालने लगा, इधर उधर पड़ा सामान रखने लगा। तभी उस बुजुर्ग ने कहा कि आप कहां जा रहे हैं, मैंने जवाब दिया कि "मैं इधर उधर ही कहीं देखता हूं, वैसे भी मैं दिन में सो ही लिया हूं सो अब सोने की अधिक आवश्यकता नहीं रही है, आप थोड़ा आराम करिए सीट पर, सर्दी भी अधिक है।"
ये दोनों शख्स मेरा मजहब नहीं जानते थे, मेरी जाति नहीं जानते थे। अगर मेरे लिबास से अंदाजा भी लगाते तो हिन्दू ही मालूम पड़ता। लेकिन उनके लिबास और दाढ़ी से साफ मालूम चल रहा था कि वो लोग मुस्लिम हैं, बिना मूछ, लंबी दाढ़ी, कुर्ता पैजामा, और एक अलग ही तरह का लहजा, बोली भारत में एक मुसलमान की पहचान करने के लिए यही काफी है. उन अंकल का नाम याद नहीं लेकिन उस लड़के का नाम याद है, सैय्यद वसीम।
मुझसे उम्र में कुछ साल बड़े सैयद ने मेरी मदद की, यह नेकदिली थी लेकिन सामान्य बात थी, लेकिन उसके अब्बू ने जो कहा वह मुझे और इस देश के तमाम लोगों को शर्म और फक्र दोनों का अहसास एक साथ कराने वाली चीज थी, शर्म उनके लिए जो मुसलमानों के लिबास देखकर ही मन में पूर्वाग्रह भर लाते हैं। फक्र उनके लिए जिन्हें इस मुल्क की साझी विरासत पर नाज है। लंबी सफेद दाड़ी वाले उस बुजुर्ग ने कहा कि उनका बेटा ज़मीन पर सो जाएगा और मैं उनके साथ सीट पर लेट जाऊं। इसीलिए जमीन पर चादर बिछाई गई है। शीत लहर के मौसम में अपने बेटे को जमीन पर सोने के लिए कहना, और एक अनजान को अपनी सीट पर जगह देने की बात का नाम ही "हिन्दोस्तां" हैं। यही वह हिन्द है जिसने विश्व के तमाम देशों को अपनी समृद्धि, संस्कृति से जलने को मजबूर किया। ऐसे अनेकों उदाहरण दिन-रात यूं ही मिल जाएंगे, यहां इत्तेफाक से मुस्लिम थे, कहीं मदद करने वाले हिन्दू होते हैं और सामने वाला मुसलमान। इन सबसे मिलकर भारत बनता है। हिन्दुस्तां वह नहीं जो टीवी पर फुटेज दिखा दिखा कर जताया जा रहा है। हिन्दुस्तां वह है जो असल जिंदगी में एक ही मुल्क में एक हवा से सांस ले रहा है।
हिंदुओं के एक बड़े तबके में मुसलमानों के लिए अजीब तरह की घृणा है, यही घृणा मुसलमानों के भी एक तबके में हिंदुओं के लिए है। लेकिन घृणा उन्हीं लोगों के मन मे है जो एक दूसरे समुदाय के लोगों से कभी मिले नहीं, दोस्ती नहीं की। घर पर नहीं गए, स्कूल में साथ नहीं घूमे, प्रेमी नहीं बने, प्रेमिकाएं नहीं बनाईं, आधे से ज्यादा हिंदुओं ने व्हाट्सएप वाला मुसलमान ही देखा है। जिसकी लंबी सी दाड़ी है-हाथ में चाकू है। जेब में बम है। उसे मदद करने वाले हाथ और मोहब्बत वाला दिल देखने को कभी नहीं दिखता। क्योंकि उसको तस्वीर ही एक ही रंग की भेजी जा रही हैं, मुसलमान से उसकी पहली मुलाकात ही इंटरनेट पर हुई थी। कुरान भी उसने आरएसएस के व्हाट्सएप ग्रुप पर पढ़ी है। आज से 4 साल पहले मैं भी मुसलमानों के प्रति इन्हीं पूर्वाग्रहों में जीता था। मुस्लिम क्षेत्र से निकलते वक्त कदमों की गति जल्दी जल्दी बढ़ती जाती थी। उन्हें देखते ही अजीब तरह का शक, डर और घृणा एक साथ आती थी। लेकिन तभी तक जब तक कि मैं असल में मुसलमानों से नहीं मिला, दोस्ती नहीं की। आज मेरे तमाम दोस्त इस मजहब के मानने वाले हैं। मैंने अपने भाई को अपने मुसलमान दोस्तों में पाया है। आज मैं जामा मस्जिद में नमाज पढ़ रही भारी भीड़ में भी अकेले चला जाता हूं लेकिन कभी नहीं लगा कि ये मस्जिद वाली भीड़ मंदिर वाली भीड़ से थोड़ी सी भी अलग हैं, वह उतने ही भावुक हैं जितने कि हिन्दू, वह उतने ही मजहबी हैं जितने कि हिन्दू, वह उतनी ही मेहमानबाजी जानते हैं जितने कि और मजहबों के लोग। आरएसएस और भाजपा की सफलता का एक ही कारण है कि उसने दोनों कौमों की सबसे बदसूरत तस्वीरें आपके बीच रखी हैं, नहीं तो इस मुल्क से अच्छा मुल्क नहीं, हिन्दू से अच्छा पड़ौसी नहीं, मुसलमान से अच्छा दोस्त नहीं।
मेरे संस्मरण (श्याम मीरा सिंह की फेसबुक प्रोफ़ाईल से साभार)

रविवार, 15 नवंबर 2020

मैं नेहरू की परछाई था--के एफ रुस्तमजी

Sunday:15th November 2020 at 9:07 AM

 नेहरुजी की  जयंती पर एल. एस. हरदेनिया की विशेष प्रस्तुति 

अगस्त 1942 में अंग्रेज़ो भारत  छोडो आंदोलन 
के दौरान महात्मा गांधी के साथ पंडित नेहरू
 
यह हमारे प्रदेश के लिए सौभाग्य की बात थी कि हमारे प्रदेश के आईपीएस कैडर के अधिकारी श्री के एफ  रुस्तमजी को छह वर्ष तक देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सुरक्षा करने का अवसर मिला। उन्हें 1952 में नेहरू जी की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। वे नेहरू जी के साथ बिताए गए समय के अनुभवों को अपनी डायरी में नोट करते रहे। बाद में इन्हें एक किताब के रूप में प्रकाशित किया गया। इस किताब के  प्रकाशन में भी हमारे प्रदेश के दो आईपीएस अधिकारियों की प्रमुख भूमिका थी। यह दो अधिकारी थे श्री राजगोपाल और श्री के एस ढिल्लों।

नेहरू जी की जयंती के अवसर पर मैं उस किताब में प्रकाशित कुछ संस्मरणों को एक लेख के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं। किताब का शीर्षक है ‘आई वास नेहरूस शेडो’ (मैं नेहरू की परछाई था)। किताब पढ़ने से एहसास होता है कि नेहरू जी कितने महान इन्सान थे। वे कभी 8-10 साल के बच्चे नजर आते हैं और कभी एक महान, गंभीर, संवेदनशील, परिपक्व व्यक्ति नजर आते हैं। संस्मरणों से पता लगता है कि अपने देश से और देश की जनता से वे कितनी मोहब्बत करते थे। सच पूछा जाए तो उनसे बड़ा देशभक्त होने का दावा कोई नहीं कर सकता।

रुस्तमजी लिखते हैं उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने के कुछ समय बाद 1952 के अगस्त माह में मैं जवाहरलाल नेहरू के साथ कश्मीर गया। उस समय नेहरूजी की आयु 63 वर्ष थी, परंतु वे 33 वर्ष के युवक नजर आते थे। वे गोरे थे, अति सुंदर थे  और सभी को अपनी ओर खींचने वाले अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे। वे सेना के जवान के समान तेजी से चलते थे। चैंपियन के समान तैरते थे और लगातार 16 घंटे काम करते थे।

उनका स्वभाव घुमक्कड़ था। अवसर मिलने पर वे खुले मैदानों में टेंट में रहना पसंद करते थे। इसी तरह की यात्रा के दौरान एक दिलचस्प घटना हुई। 1952 में वे अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर थे। इंदिरा गांधी उनके साथ थी। यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात एक आदिवासी मुखिया से हुई। मुखिया ने उनसे कहा, “मैं तुम्हारी बेटी से शादी करना चाहता हूं”। नेहरु जी ने कहा, “वह तो विवाहित और उसके दो बच्चे हैं”। इस पर आदिवासी ने कहा, “क्या हुआ हमारे हमारे यहां तो रिवाज है कि हम बीवी के साथ बच्चे भी रख सकते हैं” ।

रुस्तमजी दो और महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख करते हैं। 1955 के मार्च में नेहरू जी नागपुर की यात्रा पर थे। एकाएक एक व्यक्ति नेहरू जी की कार पर चढ़ गया। उस व्यक्ति के हाथ में एक बड़ा सा चाकू था। नेहरू जी ने उससे पूछा, “क्या चाहते हो भाई” बस यह पूछकर नेहरू गंभीर होकर बैठे रहे। चेहरे पर चिंता की लकीर तक नहीं आई। एक दिन की बात है कि नेहरू जी बिना टोपी के तीन मूर्ति भवन (प्रधानमंत्री आवास) के एक गेट से बाहर निकले और बाद में दूसरे गेट से परिसर में प्रवेश करने लगे। गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी ने उन्हें रोक दिया। नेहरु जी ने अपना परिचय दिया पर वह मानने को तैयार नहीं था कि उसके सामने  नेहरुजी खड़े हैं। नेहरु जी की पहचान टोपी पहने हुए नेहरू की थी इसलिए सुरक्षाकर्मी उन्हें नहीं पहचान पाया। काफी देर तक नेहरू और सुरक्षाकर्मी के बीच विवाद होता रहा।

नेहरु जी ने एशिया और अफ्रीका के नवोदित देशों को एक मंच पर लाने में का महान प्रयास किया था। इसी महाप्रयास के तहत इंडोनेशिया के बांडुंग में एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसी बीच नेहरू जी की श्रीलंका के प्रधानमंत्री सर जॉन कोटेलावाला से किसी मुद्दे पर गर्मागर्म बहस हो गई। बहस के दौरान नेहरू जी बहुत आक्रोशित हो गये। इसी बीच नेहरु जी ने अपना हाथ ऊंचा उठा लिया। ऐसा लग रहा था कहीं वे कोटा वाला को तमाचा न मार दें। इंदिराजी पास में ही खड़ी थी। उन्होंने हिंदी में नेहरू जी से कहा कि वे संयम रखें। इसके बाद भी दोनों के बीच बहस चलती रही। दोनों स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की तरह लड़ रहे थे। चीन के प्रधानमंत्री बीच में पड़े और अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी में उन्होंने दोनों को समझाने की कोशिश की। इसके थोड़े समय बाद नेहरु जी ने सम्मेलन को संबोधित किया। नेहरू जी का भाषण अद्भुत था।

रुस्तमजी एक और दिलचस्प घटना का उल्लेख करते हैं। नेहरू जी अजंता की गुफाओं की यात्रा पर गए। उनके साथ लेडी माउंटबेटन भी थी। इस बीच लेडी माउंटबेटन ने कॉफी पीने की फरमाइश की और वे दोनों कॉफी  पीने के लिए बैठ गये। मैंने वहां से खिसकना चाहा। जब भी मैं उठना चाहता तो नेहरु जी कहते बैठो हम लोगों के साथ पत्रकारों और फोटोग्राफरों का हुजूम था। नेहरू जी नहीं चाहते थे कि लेडी माउंटबेटन के साथ कॉफी पीने से कुछ गलतफहमी पैदा हो।

रुस्तमजी के बाद 1958 में श्री दत्त प्रधानमंत्री के मुख्य सुरक्षा अधिकारी बने। दत्त ने इस पुस्तक के संपादक को बताया कि जब भी लेडी माउंटबेटन आती थीं विदा होती थी तो नेहरु और लेडी माउंटबेटन एक दूसरे के गालों को चूमते थे। ऐसा करना पश्चिमी परंपरा है। इसके अलावा मैंने उन दोनों के बीच कुछ नहीं देखा। अतः  दोनों के संबंधों को लेकर नेहरू को बदनाम करने के लिए जो बातें  फैलाई जाती हैं, वह बेबुनियाद हैं।

जनता के बीच रहने में नेहरूजी को भारी आनंद आता था। नियमों के चलते जनसभाओं में प्रधानमंत्री के मंच और जनता के बीच में काफी दूरी रखी जाती थी। एक स्थान पर मंच और जनता के बीच में कटीले तार लगा दिए गए। नेहरूजी ने यह देखा तो मंच से कूदकर कटीले तार हटाने लगे। ऐसा करते हुए उनके हाथों से खून आने लगा। जब उन्हें बताया गया कि उन्हें ऐसा नहीं करना था तो उन्होंने कहा, कि “जनता और मेरे बीच में फासला मुझे पसंद नहीं है। यदि ऐसा आगे हुआ तो प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा देने में मैं नहीं हिचकूंगा” ।

किताब के मुखपृष्ठ पर एक अद्भुत फोटो छपी है। फोटो में नेहरू जी एक बच्चे के समान कार के बोनट पर बैठे हैं और कुछ खा रहे हैं। साथ में रुस्तमजी बैठे हैं। नेहरूजी हास्यप्रिय व्यक्ति भी थे। एक दिन रुस्तम जी ने नेहरू जी से पूछा “क्या मैं आपका फोटो ले सकता हू” इसपर नेहरूजी ने कहा “क्या मैं अपना फोटो साथ लेकर चलता हू”? रूस्तमजी ने जवाब दिया “नहीं मैं आपकी फोटो लेना चाहता हूँ” यह सुनकर नेहरुजी ने कहा, “एक अच्छा  फोटोग्राफर फोटो लेने के पहले इजाजत नहीं मांगता”। (12 नवंबर 2020)

 

शनिवार, 7 नवंबर 2020

Command Call

 Range training event at Fort Drum, N.Y 


Marine Corps Ashlee Ford repeats a command during a range training event at Fort Drum, N.Y., Nov. 6, 2020.

मंगलवार, 3 नवंबर 2020

20 कांग्रेसी कार्यकर्ताओ ने थामा भाजपा का दामन

3rd November 2020 at 5:49 PM

 यह सब जमालपुर मंडल के प्रधान भूपिंदर राय के प्रयासों से हुआ 

लुधियाना: 3 नवम्बर 2020: (पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी टीम)::

किसान आंदोलन और अकाली दल द्वारा गठबंधन तोड़ कर भाजपा का साथ छोड़ने के बावजूद भाजपा का जादू पंजाब में कम हुआ नहीं लगता। अभी भी लोग भाजपा में शामिल होना फायदे का सौदा समझते हैं। भाजपा ने दावा किया है की कांग्रेसी वर्कर अपनी पार्टी छोड़ कर भाजपा में आ मिले हैं। इस संबंध में बकदा एक प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की गई।  

भाजपा के जमालपुर मंडल के प्रधान भूपिंदर राय के प्रयासों से 20 कांग्रेसी कार्यकर्ताओ ने भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा के ज़िला प्रधान पुष्पेंद्र सिंगल ने कमांडर बलबीर सिंह के निवास स्थान पर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को सिरोपा डालकर पार्टी में शामिल किया जिसकी अध्यक्षता भाजपा के जमालपुर मंडल के प्रधान भूपिंदर राय ने की।  जिन लोगों के कांग्रेस छोड़ कर आने का दावा भाजपा ने किया है उनमें शामिल हैं-गुगु जमालपुर,सनी जमालपुर, बॉबी जमालपुर,पबिन्द्र सिंह, बलदेव सिंह, अनमोल, विक्की, सूंदर, देश राज, सूरज, बादल, ऋतिक शर्मा, संदीप सिंह, सतनाम सिंह, जसपाल सिंह,अशोक कुमार, जतिंदर दीपक आदि शामिल हैं। भाजपा की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक इन लोगों ने कांग्रेस पार्टी को अलविदा कह कर भाजपा को चुना। प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक भाजपा छोड़ने वालों ने वायदा भी किया कि आने वाले  2022 के विधासनसभा चुनावों में वह भाजपा के साथ डट कर खड़े रहेंगे।  

भाजपा ज़िला प्रधान ने इन लोगों का स्वागत करते हुए कहा कि हम साफ सुथरी एवं ईमानदार राजनीति में विश्वास रखते हैं तथा जो भी लोग पंजाब एवं पंजाब के हित की बात करता है उसका पार्टी में स्वागत है।

      इस मौके पर लुधियाना भाजपा के ज़िला महामंत्री राम गुप्ता, ज़िला उपाध्यक्ष-यशपाल जनोत्रा, मीडिया सचिव-मनमीत चावला, मनोज चौहान, कमांडर बलबीर सिंह, अवतार भाटिया, मनीष कुमार, एस के दुग्गल और विनोद जोशी भी उपस्थित थे। इसी बीच कुछ वरिष्ठ भाजपा सूत्रों का कहना है आने वाले दिनों में कई और लोग भी भाजपा में शामिल हो सकते हैं क्यूंकि भाजपा अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बन गई है। भाजपा की नीतियों को दुनिया के कई हिस्सों में पसंद किया जाता है। 

शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

वरुण परुथी से सीखिए संवेदनशीलता और दिव्यता का अंदाज़

इसे कहते हैं मीडिया और कलम का दिव्य सदुपयोग  

लुधियाना: 31 अक्टूबर 2020: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::

मीडिया में होने के कारण बहुत से ख़ास लोगों से भेंट अक्सर ही आसानी से हो जाती है लेकिन इसके बावजूद बहुत से लोग छूट भी जाते हैं। इन्हीं में से होते हैं कुछ ख़ास लोग और कुछ आम लोगो। उन्हीने में से एक हैं वरुण परुथी। जिसके मन में आज के इस कारोबारी युग में इन्सानियत ज़िंदा है। 
वरुण परुथी एक बहुत ही लोकप्रिय एक्टर, यूटयूबर और सबसे बढ़ कर संवेदनशील इंसान हैं। मन में आया तो अपना यू टयूब चैनल बना लिया। आरम्भिक दौर में ही सफलता इतनी मिली कि नाम बुलंदी पर पहुँच गया। अब तो उनकी पोस्टें लघु फ़िल्में जैसी महसूस होती हैं। कम बजट के बावजूद बहुत ही बड़ा संदेश देने वाली छोटी छोटी फ़िल्में। उन की बनाई गयी फ़िल्में आम तौर पर उन विषयों पर होती हैं जिनसे बहुत से लोग अक्सर किनारा कर जाते हैं। यूटयूब पर अपना अपना वैब चैनल चलाने वालों में से भी बहुत से अच्छे पत्रकार भी उन विषयों पर काम करना ठीक नहीं समझते क्यूंकि उनसे कोई पैसा आम तौर पर नहीं मिलता। लेकिन वरुण परुथी तो अनूठे निकले। उनकी अधिकतर  पोस्टें तकरीबन तकरीबन इसी तरह के विषयों पर मिलेंगी। 
त्योहारों का मौसम हो या ज़िंदगी की कड़की दिखाने वाले हालात वरुण परुथी उन्हीं विषयों को चुनते हैं जो ज़िंदगी के उन्हीं रंगों को दिखाते हैं जिन्हें गर्दिश के रंग कहा जाता है। सुना है गर्दिश के उन अंधेरे दिनों में तो अपना साया भी साथ छोड़ जाता है। गरीबी और दरिद्रता में अपने रिश्तेदार भी कोई रिश्ता रखना ठीक नहीं समझते। इस बेहद नाज़ुक दौर में ही वरुण परुथी याद दिलाते हैं की इंसानियत का रिश्ता इसी वक़्त में निभाना ज़रूरी होता है। ज़ाहि वक़्त होता है जब अपने अंदर छुपी दिव्यता को आप दुनिया  मिसाल बन कर सामने लाएं लेकिन बिना किसी को कुछ भी जताने के। चुपचाप बहुत ही ख़ामोशी से अपनी सहायता का हाथ ज़रूरतमंद लोगों की तरफ बढ़ाएं।
इसी पोस्ट के आरम्भ में दी गयी वीडियो देखने में कोई दिक्क्त आए तो आप उसे यहां क्लिक करके भी देख सकते हैं--

वरुण परुथी बहुत ही मासूमियत से पूछते हैं
दीपावली पर भी खुशियां न बांटी तो कब आयेगा ऐसा दिन? वह नहीं चाहते आप अपने बेशुमार धन दौलत का उपयोग केवल नई नई गाड़ियां खरीदने, कोठियां खरीदने या अपनी व्यक्तिगत प्रसन्नता के लिए करें। वह बहुत ही प्रभावी  देते हैं थोड़ा सा वक़्त और थोड़ा सा धन उनके लिए भी खर्च करो जिनके पास किसी भी भयउ वजह से कुछ नहीं बचा। अगर आपने उन्हें देख कर भोई नज़रअंदाज़ कर दिया तो आप कभी भी सच्ची खुशियां हासिल न कर पाएंगे।  

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

चार्ली हेब्डो कार्टून और समकालीन विश्व में ईशनिंदा कानून

  राम पुनियानी                                                                  28 अक्टूबर 2020  

Lyon France में पुलिस की मौजूदगी-फाईल फोटो जिसे क्लिक किया Ev (Unsplash) ने 

रूसी मूल के 18 साल के मुस्लिम किशोर द्वारा फ्रांस के स्कूल शिक्षक सेम्युअल पेटी की हत्या ने एक अंतर्राष्ट्रीय विवाद को जन्म दे दिया है। एक ओर फ्रांस के राष्ट्रपति ने मृत शिक्षक का समर्थन करते हुए राजनैतिक इस्लाम का मुकाबला करने की घोषणा की है तो दूसरी ओर, तुर्की के राष्ट्रपति एर्डोगन ने फ्रांस के राष्ट्रपति के बारे में अत्यधिक अपमानजनक टिप्पणी की है। प्रतिक्रिया स्वरूप, फ्रांस ने तुर्की से अपने राजदूत को वापिस बुलवा लिया है। इस दरम्यान अनेक मुस्लिम देशों ने फ्रांस के उत्पादों का बहिष्कार प्रारंभ कर दिया है। इसके साथ ही अनेक मुस्लिम देशों ने फ्रांस के राष्ट्रपति के विरूद्ध अपना आक्रोश व्यक्त किया है। पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत अनेक मुस्लिम देशों में विरोध प्रकट करने के लिए लोग सड़कों पर भी उतरे। 

लेखक डा. राम पुनियानी 
पेटी अपनी कक्षा में अभिव्यक्ति की आजादी का महत्व समझा रहे थे और अपने तर्कों के समर्थन में उन्होंने ‘चार्ली हेब्डो’ में प्रकाशित कार्टून बच्चों को दिखाए. इसके पहले उन्होंने कक्षा के मुस्लिम विद्यार्थियों से कहा कि अगर वे चाहें तो क्लास से बाहर जा सकते हैं. यहां यह उल्लेखनीय है कि चार्ली हेब्डो के कार्टूनिस्टों की 2015 में हुई हत्या का मुकदमा अदालत में प्रारंभ होने वाला है. इस संदर्भ में यह जिक्र करना भी उचित होगा कि चार्ली हेब्डो ने पैगम्बर का उपहास करने वाले कार्टूनों का पुनर्प्रकाशन किया था. ये कार्टून इस्लाम और पैगम्बर मोहम्मद को आतंकवाद से जोड़ते हैं. इन कार्टूनों की पृष्ठभूमि में 9/11 का आतंकी हमला है जिसके बाद अमरीकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढ़ा और यह शब्द जल्दी ही काफी प्रचलित हो गया. चार्ली हेब्डो में इन कार्टूनों के प्रकाशन के बाद पत्रिका के कार्यालय पर  हमला हुआ, जिसमें उसके 12 कार्टूनिस्ट मारे गए. इस हिंसक हमले की जिम्मेदारी अलकायदा ने ली. यहां यह  उल्लेखनीय है कि अलकायदा को पाकिस्तान स्थित कुछ मदरसों में बढ़ावा दिया गया. इन मदरसों में इस्लाम के सलाफी संस्करण का उपयोग, मुस्लिम युवकों के वैचारिक प्रशिक्षण के लिए किया जाता था. सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन मदरसों का पाठ्यक्रम वाशिंगटन में तैयार हुआ था. अलकायदा में शामिल हुए व्यक्तियों के प्रशिक्षण के लिए अमेरिका ने आठ अरब डालर की सहायता दी और सात हजार टन असला मुहैया करवाया.

इसके नतीजे में पिछले कुछ दशकों से अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच, विशेषकर पश्चिम एशिया, पर आतंकवाद छाया हुआ है. मुसलमानों में अतिवाद दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है. इस बीच अनेक देशों ने ईशनिंदा कानून बनाए और कुछ मुस्लिम देशों ने ईशनिंदा के लिए मृत्युदंड तक का प्रावधान किया. इन देशों में पाकिस्तान, सोमालिया, अफगानिस्तान, ईरान, सऊदी अरब और नाईजीरिया शामिल हैं.

हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में जनरल जिया उल हक के शासनकाल में ईशनिंदा के लिए सजा-ए-मौत का प्रावधान किया गया था. इसके साथ ही वहां इस्लामीकरण की प्रवृत्तियां भी तेज हो गईं. इसका एक नतीजा यह हुआ कि इन देशों में इस्लाम का अतिवादी संस्करण लोकप्रिय होने लगा. इसका जीता-जागता उदाहरण आसिया बीबी हैं जिन्हें ईशनिंदा का आरोपी बनाया गया था. पाकिस्तानी पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर की निर्मम हत्या कर दी गई क्योंकि उन्होंने न सिर्फ इस कानून का विरोध किया वरन् जेल जाकर आसिया बीबी से मुलाकात भी की. इसके बाद तासीर के हत्यारे का एक नायक के समान अभिनंदन किया गया.

इस्लाम के इतिहासकार बताते हैं कि पैगम्बर मोहम्मद के दो सौ साल बाद तक इस्लाम में ईशनिंदा संबंधी कोई कानून नहीं था. यह कानून नौवीं शताब्दि में अबासिद शासनकाल में पहली बार बना. इसका मुख्य उद्देश्य सत्ताधारियों की सत्ता पर पकड़ मजबूत करना था. इसी तरह, पाकिस्तान में जिया उल हक ने अपने फौजी शासन को पुख्ता करने के लिए यह कानून लागू किया. इसका लक्ष्य इस्लामी राष्ट्र के बहाने अपनी सत्ता को वैधता प्रदान करना था. सच पूछा जाए तो फौजी तानाशाह, समाज में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहते थे. इसके साथ ही गैर-मुसलमानों और उन मुसलमानों, जो सत्ताधारियों से असहमत थे, को काफिर घोषित कर उनकी जान लेने का सिलसिला शुरू हो गया. पाकिस्तान में अहमदिया और शिया मुसलमानों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा. ईसाई और हिन्दू तो इस कानून के निशाने पर रहते ही हैं.

अभी हाल में (25 अक्टूबर) एक विचारोत्तेजक वेबिनार का आयोजन किया गया. इसका आयोजन मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी नामक संस्था ने किया था. वेबिनार में बोलते हुए इस्लामिक विद्वान जीनत शौकत अली ने कुरान के अनेक उद्वरण देते हुए यह दावा किया कि पवित्र ग्रंथ में इस्लाम में विश्वास न करने वालों के विरूद्ध हिंसा करने की बात कहीं नहीं कही गई है (कुरान में कहा गया है ‘तुम्हारा दीन तुम्हारे लिए, मेरा दीन मेरे लिए’). वेबिनार का संचालन करते हुए जावेद आनंद ने कहा कि ‘‘हम इस अवसर पर स्पष्ट शब्दों में, बिना किंतु-परंतु के, न केवल उनकी निंदा करते हैं जो इस बर्बर हत्या के लिए जिम्मेदार हैं वरन् उनकी भी जो इस तरह के अपराधों को प्रोत्साहन देते हैं और उन्हें उचित बताते हैं. हम श्री पेटी की हत्या की निंदा करते हैं और साथ ही यह मांग करते हैं कि दुनिया में जहां भी ईशनिंदा संबंधी कानून हैं वहां उन्हें सदा के लिए समाप्त किया जाए’’.

इस वेबिनार में जो कुछ कहा गया वह महान चिंतक असगर अली इंजीनियर की इस्लाम की विवेचना के अनुरूप है. असगर अली कहते थे कि पैगम्बर इस हद तक आध्यात्मिक थे कि वे उन्हें भी दंडित करने के विरोधी थे जो व्यक्तिगत रूप से उनका अपमान करते थे. इंजीनियर, पैगम्बर के जीवन की एक मार्मिक घटना का अक्सर उल्लेख करते थे. पैगम्बर जिस रास्ते से निकलते थे उस पर एक वृद्ध महिला उन पर कचरा फेंकती थी. एक दिन वह महिला उन्हें नजर नहीं आई. इस पर पैगम्बर तुरंत उसका हालचाल जानने उसके घर गए. यह देखकर वह महिला बहुत शर्मिंदा हुई और उसने इस्लाम स्वीकार कर लिया.

यहां यह समझना जरूरी है कि आज के समय में इस्लाम पर असहिष्णु प्रवृत्तियां क्यों हावी हो रही हैं? इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जब मुस्लिम शासकों ने इन प्रवृत्तियों का उपयोग सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए किया. वर्तमान में इस प्रवृत्ति में नए आयाम जुड़ गए हैं. सन् 1953 में ईरान में चुनी हुई मोसादिक सरकार को इसलिए उखाड़ फेंका गया क्योंकि वह तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करने वाली थी. यह सर्वविदित है कि इन कंपनियों से  अमेरिका और ब्रिटेन के हित जुड़े हुए थे. समय के साथ इसके नतीजे में कट्टरपंथी अयातुल्लाह खौमेनी ने सत्ता पर कब्जा कर लिया. वहीं दूसरी ओर अफगानिस्तान पर सोवियत कब्जे के बाद अमेरिका ने कट्टरवादी इस्लामिक समूहों को प्रोत्साहन दिया. इसके साथ ही मुजाहिदीन, तालिबान और अलकायदा से जुड़े आतंकवादियों को प्रशिक्षण देना भी प्रारंभ किया. नतीजे में पश्चिमी एशिया में अमेरिका की दखल बढ़ती गई जिसके चलते अफगानिस्तान, ईराक आदि पर हमले हुए और असहनशील तत्व हावी होते गए जिसके चलते पेटी की हत्या जैसी घटनाएं होने लगीं.

ईशनिंदा एवं ‘काफिर का कत्ल करो’ जैसी प्रवृत्तियों को कैसे समाप्त किया जाए, इस पर बहस और चर्चा आज के समय की आवश्यकता है. 

(हिंदी रूपांतरणः अमरीश हरदेनिया) 

(लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

किसी मनुष्य को कुत्ता कह कर कुत्ते का अपमान न करें

 गौर कीजिये-बहुत सी विशेषताएं हैं कुत्तों में जनाब!
*इस यादगारी और भवनात्मक तस्वीर को क्लिक किया जानेमाने कैमरामैन Atharva Tulsi (Unsplash) ने 

लुधियाना: 24 अक्टूबर 2020: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::

ये बोला दिल्ली के कुत्ते से गाँव का कुत्ता!
कहाँ से सीखी अदा तू ने दुम दबाने की!
वो बोला दुम के दबाने को बुज़-दिली न समझ!
जगह कहाँ है यहाँ दुम तलक हिलाने की!
                                       ---साग़र ख़य्यामी

यह तस्वीर दिल्ली में बने हुए किसी पुराने बादशाह के मकबरे की है लगता है तस्वीर में नज़र आ रहे कुत्ते ने कई दिनों से नहाने की ज़रूरत भी नहीं समझी या फिर नहाने जितना पानी ही उसे उपलब्ध नहीं हुआ क्यूंकि पानी के बंटवारे को लेकर तो लड़ाई झगड़ों का माहौल गरमाया हुआ है। इस हालत के बावजूद यह कुत्ता खुश लग रहा है। शायद इसी लिए कहा जाता है कि कुत्ते दरवेश होते हैं। इस संबंध में कई कहानियां भी प्रचलित हैं।  कुत्तों को भूत-प्रेत भी नज़र आ जाते हैं। जहाँ भी रहते हैं वहां के परिवार में मृत्यु की दस्तक आने पर कुत्ते उसे झट से पहचान लेते हैं और भौंकना शुरू कर देते हैं या रोना शुरू कर देते हैं।  बहुत से लोगों ने देखा होगा की जब कोई कुत्ता रोने लगता है तो कुछ ही घंटों में उस गली के किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है। समझना आ जाए तो ये अपनी भाषा में बहुत सी काम की बातें भी कहते हैं। 

बहुत से अघोरी और अन्य साधु भी कुत्तों को अपने साथ रखना ज़रूरी समझते हैं। इस बात को न भी माना जाये तो भी इसकी वफादारी तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसकी सूंघने की शक्ति और इसकी मेघा भी बहुत विशेष होती है। पुलिस और सेना में कुत्ते बहुत ही काम के होते हैं। पहले तो कुत्तों के वृद्ध होने पर सेना में उन्हें गोली मार कर मार दिए जाने का चलन भी था लेकिन अब इसे सुधारा जा रहा है। वृद्धा अवस्था में कुत्तों के पुनर्वास करने की बातें भी सुनी गई हैं। बहुत से अमीर लोगों के परिवारों में कुत्तों को विशेष सम्मान मिलता है। जो परिवार कुत्तों को पालने के शौक़ीन हैं वे इसे पारिवारिक सदस्य की तरह ही स्नेह करते हैं। अब सरकारें भी लोगों की इस भावुक कमज़ोरी को समझ गई हैं और उनके पालने पर नई नई किस्म के टेक्स और खर्चे घोषित हो रहे हैं। कुत्ते पालना अब महंगा सौदा हो गया है। 

इसी बीच कई बरसों से कुत्तों का कारोबार बहुत मुनाफा भी देने लगा है। छोटे छोटे पिल्लै बहुत महंगे भाव पर बिकते हैं। कुत्तों के अच्छे कारोबारी कुत्तों को  समय उन्हें सबंधित टीके इत्यादि लगवा कर ही बेचते हैं। 
इससे उन्हें हलकाने या कोई अन्य रोग नहीं होता। जब भी इतिहास लिखा गया तो यह बात दर्ज रहेगी कि जब लोग अपने परिवारों और देशों के साथ वफादारी भूल गए थे तो उस स्वार्थ भरे दौर में भी कुत्ते वफ़ादारी की मिसाल बने रहे। 

इस लिए एक निवेदन है आप सभी से। जब भी किसी आज के किसी तथाकथित इंसान, बेवफा व्यक्ति, धोखेबाज़ मित्र या ऐसे किसी भी अन्य मनुष्य को गाली देने का मन करे तो कृपया उसे कुत्ता कह कर कुत्ते का अपमान न करें।