मंगलवार, 10 मार्च 2020

शाहीन बाग़ लुधियाना में नज़र आये होली के रंग तिरंगे के संग

 10th March 2020 at 6:18 PM
सख्तियों और साज़िशों से नहीं रुकेगा यह देशव्यापी आंदोलन 
लुधियाना शाहीन बाग में हाजी सलीम रंगों से बच्चों के चेहरे पर तिरंगा बनाते हुए
लुधियाना: 10 मार्च 2020: (पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी ब्यूरो)::
आज लुधियाना में इस आंदोलन का 28वां दिन था। सर्दी, गर्मी, बारिश और ओले। मौसम की हर मार यहां बैठे लोगों ने मुस्कराते हुए झेली। धमकियों और साज़िशों का मुकाबिला भी पूरी तरह शांत रहते हुए सब्र से किया। हर रोज़ अपने  को दोहराया कि हम इस कानून को सहन नहीं करेंगे। नागरिकता देने के प्रावधान तो पहले से ही मौजूद थे यह नया ड्रामा क्यूं?  इस मौके पर शाही इमाम पंजाब के मुख्य सचिव मुहम्मद मुस्तकीम अहरार और अन्य वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि भारत सभी धर्म का देश है और सी.ए.ए नफरत फैलाने वाला एक ऐसा कानून है जिसे कबूल नहीं किया जाएगा। आज होली के अवसर पर होली के रंग भी तिरंगे के संग मनाये गए। उल्लेखनीय है कि साम्प्रदायिक लोग यहां गड़बड़ी के संकेत दे चुके हैं और शाहीन बाग़ सतर्क भी है। 
CAA के खिलाफ पंजाब के वाम संगठन भी पूरी तरह सक्रिय
CAA को केंद्र सरकार का काला कानून बताते हुए इसके खिलाफ शहर की दाना मंडी में चल रहे शाहीन बाग प्रदर्शन  लगातार जारी है। आज 28वें दिन भी बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं यहां पहुंची। इस अवसर पर विशेष कर हैबोबाल बल्लो की से प्रधान नाजिम सलमानी, शहजाद हुसैन, इरफान, महफूज़ रहमान, आसिफ हुसैन, सलीम, रियाज, लियाकत, मुन्तजिर, असगर सलमानी और जालंधर से नासिर हुसैन, अब्दुल बारी, कय्यूम, मुज़म्मिल सलमानी की अध्यक्षता में काफिले पहुंचे। मंगलवार को शाहीन बाग में होली के त्यौहार के मद्देनजर बड़ी संख्या में लोगों ने हाजी सलीम जी से अपने चेहरे पर तिरंगे बनवा कर कौमी एकता और भाईचारे का संदेश दिया। प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए शाही इमाम पंजाब के मुख्य सचिव मुहम्मद मुस्तकीम अहरार ने कहा कि भारत सर्व धर्म का देश है और सी.ए.ए नफरत फैलाने वाला एक कानून है जिसे कबूल नहीं किया जाएगा।
CAA के खिलाफ पंजाब के वाम संगठन भी पूरी तरह सक्रिय
मुस्तकीम अहरार ने कहा कि आज लुधियाना शाहीन बाग में होली के दिन बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने पहुंच कर आपसी भाईचारे प्यार और मोहब्बत का जो संदेश दिया है उसकी मिसाल नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि सी.ए.ए., एन.पी.आर. और एन.आर.सी के खिलाफ आंदोलन देशव्यापी है इसे सरकारी तंत्र अपनी साजिशों द्वारा रोक नहीं पाएगा। उन्होंने कहा कि आंदोलन में रोजाना बड़ी संख्या में पहुंचने वाली मां, बहनें और बेटियां बधाई की पात्र हैं जिन्होंने देश भर के लोगों की नागरिकता बचाने के लिए कमर कसी हुई है। उल्लेखनीय है कि  लगातार शांतिपूर्ण ढंग से जारी इस लोकतान्त्रिक आंदोलन ने केंद्र सरकार और  समर्थकों की नींद उड़ा रखी है।  आने वाले दिनों में इस आंदोलन के रंगरूप में और तेज़ी आने की सम्भावना है।

CAA के खिलाफ पंजाब के वाम संगठन भी पूरी तरह सक्रिय

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

कहानी//भीमा गुरु//शुचि(भवि)

जीवनशैली में आई गिरावट को दर्शाती रचना
हरिद्वार की हरकी पौड़ी पर बेहद ही चहल पहल सी थी।विष्णु,अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ मस्त मलंग हो भीड़,अभिराम दृश्यों का आनंद ले टहल रहा था। बिटिया की अंगुली बीच बीच में छूट जाती थी तो वो पापा,पापा कह दौड़ती आती थी।
छोटा बेटा माँ के साथ धीरे धीरे कुछ कदम पीछे चहलकदमी करता चल रहा था।
      बिटिया ने अचानक पिता की अंगुली खिंची और एक कचड़े के ढेर की तरफ इशारा किया।
एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति,कचड़े के ढेर में से कुछ चुन कर खा रहा था।विष्णु अपनी बिटिया का हाथ थामे कुछ पास गया।ध्यान से चुपचाप अधेड़ व्यक्ति को देखता रहा।वह कचड़े में से चने,फल्ली,इत्यादि अन्न के दाने चुन कर खा रहा था।
     विष्णु ने देखा पास ही एक चाय का ठेला है।बिटिया की छमछम के साथ वह चाय के ठेले से एक ब्रेड खरीद लाया। अधेड़ व्यक्ति के एकदम निकट पहुँच उसे थपथपाते हुए बुलाया और ब्रेड देते हुए बोला,"आपके लिए है श्रीमान,खा लें,शायद आप भूखे हैं??"
     वह अधेड़ व्यक्ति उठा,घूमा और गुस्से में तमतमाते हुए बोला,"माफ़ कीजियेगा,आपने क्या मुझे भिखारी समझा है?मैंने तो आपसे भीख नहीं मांगी,,मांगूगा भी क्यों? पास के गाँव में मेरी कइयों एकड़ जमीन है,मेरे बेटे उसमें खेती करते हैं,बड़ा मकान,दुकान सब कुछ है मेरे पास उस ईश्वर की दया से,ये ब्रेड आप ही खाएँ।"
     विष्णु और नन्ही बिटिया के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।अधेड़ व्यक्ति फिर से कचड़े से चने चुन कर खाने लगा।विष्णु भी अब चने चुनने लगा और कुछ चने खुद खाये और कुछ बिटिया को दिए।दूर खड़ी पत्नी और बेटे को भी आवाज़ दी चने लेने,पर वे नाक भों सिकोड़ पास तक भी न आये।बिटिया चने खाते हुए पूछने लगी,"बाबा,आपके पास सबकुछ है,फिर ये कचड़ा क्यों खाते हो?"
     अब वह उस बिटिया की ओर पलटा और मुस्कुराते हुए बोला,"बेटे ये कचड़ा नहीं,अन्न देवता है,कुछ बेवकूफों ने अन्न ब्रह्म को यहाँ फेंक कर उसका  अपमान किया है ,मैं तो बस अन्न देवता को मान दे रहा हूँ,और बाबा नहीं,मेरा नाम भीमा है बिटिया।"
       विष्णु की आँखों से निर्मल गंगा बह निकली।झुक कर उसने भीमा के पाँव छुए और बिटिया से भी यही करने कहा।विष्णु और भीमा ने कुछ देर बातचीत की और विदा हुए।
      बिटिया को ब्रेड देते हुए पिता ने कहा कि ये भीमा गुरु का प्रसाद है,जिसे वो सम्हाल कर रखे।बिटिया ने पूछा, गुरु???वो कैसे पापा???
       विष्णु ने उसे समझाते हुए कहा, गुरु वही होता है जो केवल ज्ञान देता ही नहीं बल्कि उस ज्ञान को जीता भी है।भीमा हमारा गुरु इसलिए हुआ बिटिया क्योंकि वो "अन्न ब्रह्म है",इस ज्ञान को जीता है।हर वो व्यक्ति हमारा गुरु है बिटिया ,जो हमें कुछ साकार ज्ञान दे जिसे वो स्वयं जीता भी हो।
      इस घटना को कई वर्ष बीत गए,परंतु आज भी ,उस नियत तारीख,भीमा गुरु का प्रसाद ,जो अब सूखी ब्रेड (टोस्ट ) है,के कुछ टुकड़े विष्णु और उसकी बिटिया खाते हैं और तब से अब तक न ही थाली में,न रसोई में,न ही किसी पार्टी में,वे दोनों ही ,अन्न ब्रह्म का अपमान कुछ जूठन छोड़ कर ,कभी नहीं करते हैं।--शुचि(भवि)

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

नहीं रही मेरी मां की मां-दोराहा हुआ बेगाना सा

 दोराहा का नाम लेते ही काटेगी गहरी उदासी
दोराहा (लुधियाना): 8 फरवरी 2020: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::
एक गीत मेरे जन्म से भी बहुत पहले लोकप्रिय हुआ करता था-
नानी  अम्मा नानी अम्मा मान जाओ। 
छोड़ो भी यह गुस्सा 
ज़रा हंस के दिखाओ-
नानी अम्मा नानी अम्मा जाओ। 
लेकिन मेरी मां की मां अर्थात मेरी नानी गोबिंद कौर आज मुझसे हमेशां के लिए रूठ गई। सुबह सुबह पांच बज कर 12 मिनट पर मेरी नानी अम्मा की तबीयत कुछ बिगड़ी और सुबह सुबह 5:30 पर उसने हमेशां के लिए अलविदा कह दी। मौत उनको छीन के लेजा चुकी थी। अनहोनी हो चुकी थी। हम सभी भी दोराहा पहुंचे। उसी घर में जहां से कभी मेरी मां ने शादी के बाद का नया जीवन शुरू करने के लिए विदा ली थी। नानी ने उसे दुल्हन के लिबास में विदा किया था। फिर अचानक 10 जुलाई 2013 को मेरी मां कल्याण कौर सुबह सुबह करीब 3:30 बजे मुझे और मेरी बहन शीबा को हमेशां के लिए छोड़ गई। सुबह सुबह जब लोग भगवान की साधना तपस्या करते  हैं उस समय उसकी तबियत कुछ घबराई थी। उस ने मुझ से पानी ले कर दो घूंट पानी पिया और लेट गईं लेकिन हमेशां की नींद। मुझे यूं लगा था जैसे हम दोनों बहनों के हाथों से हमारा सारा संसार अचानक इतनी गहरी खामोशी से छिन  गया। मौत का मूक और भयावह चेहरा हमने पहली बार इतनी निकटता से देखा था। पापा भी उस समय लैपटॉप पर अपना काम कर रहे थे। हम में से कोई कुछ नहीं कर पाया। हम लुटे लुटे से सब देखते रह गए। उस असहनीय दर्द के समय नानी ने हमें बहुत हौंसला दिया। जब भी मन उदास होता हम दोराहा नानी के घर चले जाते। कुछ देर वहां रह कर ऐसे लगता जैसे मां से मुलाकात हो गई। हम खुश हो कर घर लौट आते। नानी का घर खुशी का घर बन गया था। मां से मुलाकात कराने वाला जादू का घर। आज उसी घर में नानी की मृत देह रखी थी। उदासी का माहौल। मासियां मामियां सब रो रहीं थीं। सब की तरह मैंने भी चादर हटा कर नानी का चेहरा देखा। यूँ लग रहा था जैसे नानी किसी गहरी नींद या गहरी समाधी में हो। दो चार आवाज़ें भी दी लेकिन नानी नहीं बोली। मैंने उस कमरे से बाहर आ कर देखा। आस पड़ोस के लोगों और रिश्तेदारों की भीड़ लगी थी। घर का एक एक कोना मुझे याद दिला रहा था यहां नानी हमें देसी घी के परांठे खिलाया करती थी। इस दीवार की तरफ नानी हमारे लिए खीर बनाया करती थी। उस कोने में नानी अचार से भरा बड़ा सा मर्तबान हमें घर के लिए बांध दिया करती थी। उन दीवारों को देख कर बहुत कुछ याद आया। कभी लगता बस इधर से आएंगे बीजी और कहेंगे कम से कम दो परांठे और खाओ। कभी लगता बीजी अभी अभी कमरे से निकलेंगे और कहेंगे खीर कम क्यों डाली पूरी प्लेट भर कर खाओ। लेकिन किसी न किसी के रोने पर हर बार कल्पना टूट जाती। बार बार हकीकत का भान होता कि अब बीजी कभी नहीं आएंगे। कालेज की पढ़ाई और मां के बिन घर चलाना आसान नहीं होता।  इसलिए मैं चाह कर भी काफी समय से नानी के पास नहीं जा पायी। आज जब चिता जल रही थी  अग्नि में से बीजी का चेहरा नज़र आने लगा। आवाज़ भी सुनाई देती महसूस हुई जैसे कह रहे हों अब आई हो! कुछ पहले आ जाती! 
अफ़सोस हम उस देश में हैं जहां ज़िंदगी के झमेले हमें वक़्त रहते एक दुसरे से मिलने भी नहीं देते। जैसे रोज़ी रोटी के लिए विदेशों में गए लोग भी किस न किसी का देहांत होने के समय अपने बज़ुर्गों के पास नहीं होते उसी तरह हम स्वदेश में रह कर भी छोटे छोटे झमेलों में उलझे रहते हैं। जब तक निकल पाते हैं तब तक बहुत देर हो  चुकी होती है जैसे कि मुझे हो गई। अभी तीन दिन पहले उनसे वीडीओ कॉलिंग पर बात हुई।  वह कमज़ोर तो दिख रहे थे लेकिन ऐसा तो नहीं लगता था कि वह हमेशां  के लिए चले जायेंगे। 
वास्तव में दुःखों का दीमक उन्हें भी बहुत पहले लग चूका था। इसका गम--उसका गम न जाने कितने गम। शायद यही हमारी सभी की नियति बन गई है। हम सभी के साथ भी यही होता है या फिर होने वाला होता है। पूरे परिवार को संभालने और बच्चों को सैट करने में उन्होंने लगातार संघर्ष किया। सभी बच्चों के शादी विवाह और पढ़ाई लिखाई कोई आसान काम नहीं था। उन्होंने उस समय में बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाई जब ज़माने की हवा बेटियों को पढ़ाने के खिलाफ चल रही थी। पूरे समाज के साथ टक्कर ले कर उन्होंने समाज के नव निर्माण में योगदान दिया। मुझे मेरी मां अपनी मां अर्थात मेरी नानी की बहुत सी बातें बताया करती थी। आज वह सभी बातें एक एक करके याद आ रही हैं लेकिन नानी के जाने बाद। काश यह सब पहले याद आ जाता। उनके होते होते याद आ जाता। मौत हमें कितना बेबस कर देती है और न जाने कितना कुछ याद भी दिला देती है। वही आज हम सभी के साथ भी हो रहा है।  
अंत में नानी मां को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए सन 1966 में आई फिल्म दादी मां का लोकप्रिय गीत सुनिए, देखिये और पढ़िए जिसे लिखा था जनाब मजरूह सुल्तानपुरी साहिब ने और संगीत से सजाया था रौशन जी ने। इस यादगारी गीत के लिए आवाज़ें थीं महेंद्र कपूर, मन्ना डे और ऊषा मंगेशकर जी ने। 
उसको नहीं देखा हमने कभी
पर इसकी ज़रुरत क्या होगी
ऐ माँ, ऐ माँ तेरी सूरत से अलग
भगवान की सूरत क्या होगी, क्या होगी
उसको नहीं देखा हमने कभी

इनसान तो क्या देवता भी
आँचल में पले तेरे
है स्वर्ग इसी दुनिया में
क़दमों के तले तेरे
ममता ही लुटाये जिसके नयन
ऐसी कोई मूरत क्या होगी
ऐ माँ, ऐ माँ तेरी सूरत...

क्यों धूप जलाए दुखों की
क्यों गम की घटा बरसे
ये हाथ दुआओं वाले
रहते हैं सदा सर पे
तू है तो अँधेरे पथ में हमें
सूरज की ज़रुरत क्या होगी
ऐ माँ, ऐ माँ तेरी सूरत...

कहते हैं तेरी शान में जो
कोई ऊँचे बोल नहीं
भगवान के पास भी माता
तेरे प्यार का मोल नहीं
हम तो यही जानें तुझसे बड़ी
संसार की दौलत क्या होगी
ऐ माँ, ऐ माँ तेरी सूरत  से अलग भगवान की सूरत क्या होगी--क्या होगी!
अभी कुछ लिखा नहीं जा रहा। वक़्त गुज़रने के साथ शायद इस सदमे को सहने की कुछ शक्ति मिले। अगली पोस्ट में मां के संघर्षों की चर्चा भी होगी और नानी के संघर्षों की भी। इस लिए नहीं कि वह मेरी मां और नानी हैं बल्कि इसलिए कि समाज को बदलने के लिए भी उन्होंने काफी कुछ किया। आज भी समाज को ऐसी महिलाओं  की सख्त  ज़रूरत है जो बदलाव के काम में योगदान दे सकें।  सह प्रयास--कार्तिका सिंह//शीबा सिंह 

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

फिल्म के पांच यादगारी गीतों में इस गीत का जादू अनूठा ही था

मन की शक्ति का फलसफा भी याद दिलाती है फिल्म अनुराग 
फ़िल्मी दुनिया-फ़िल्मी यादें: 9 जनवरी 2020: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::
अपने ज़माने में हिंदी फ़िल्म "अनुराग" बहुत हिट हुई थी। सन 1972 के आखिरी महीने दिसंबर में रिलीज़ हुई इस फिल्म ने दर्शकों को चुंबक की तरह खींचा था। निर्माता निर्देशक थे शक्ति सामंत।  मौसमी चटर्जी की तो यह पहली फिल्म थी। राजेश खन्ना भी इसी फिल्म के एक छोटे से रोल में नज़र आए। इसी फिल्म को सन 1973 का फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला। मध्य वर्ग के लोगों ने तो एक से ज़्यादा बार भी यह फिल्म देखी। यह एक ऐसी प्रेम कहानी है जो आंखों की रौशनी को केंद्रीय बिंदु बना कर बनी गई है। नायक पूरी तरह अच्छा भला लेकिन नायका की आंखों में रौशनी नहीं। ऐसी स्थिति में भी प्रेम होता है और पूरी शिद्दत से होता है। यूं कह लो कि इश्क यहां भी अपना लोहा मनवा लेता है। इसी फिल्म का एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस फिल्म में नायक का नायिका से वायदा है: फिल्म के पांच यादगारी गीतों में इस गीत का जादू अनूठा ही था 
तेरे नैनों के मैं दीप जलाऊँगा
अपनी आँखों से दुनिया दिखलाऊँगा
नायक और नायका शायद सागर के सामने खड़े हैं। सागर और हवा की अठखेलियों का सहारा ले कर रूमानी सा माहौल बनाया जाता है और इसी माहौल में गीत शुरू होता है एक सादा किस्म के सवाल से--वो क्या है?
जवाब भी बहुत सीधा और सादा से। वो क्या है पूछे जाने पर जवाब मिलता है-इक मंदिर है। नया सवाल होता है उस मंदिर में? इसका जवाब भी बहुत सीधा सा-उस इक मूरत है। अगला सवाल है--वो मूर्त कैसी होती है-जवाब बहुत ही रूमानी है--तेरी सूरत जैसी होती है...! कितनी दिव्यता है गीत के इन बोलो में। कितना विश्वास है। इसी गीत के किसी अगले सवाल में एक अंधी लड़की को जब उसका प्रेमी तीसरा सवाल करता है कि तुमने कैसे जान लिया? इस सवाल से दिल, दिमाग और मन फ़िल्म के सभी दृश्यों से किसी हल्की सनसनी की तरह कट जाता है दर्शक को इसका न तो अहसास होता है और न ही कोई झटका लगता है। यही है निर्देशक का कमाल कि दर्शक भी फ़िल्म के दृश्यों और गीत के बोलों के साथ बहता हुआ यही पूछने लगता है-तुमने कैसे जान लिया? इस सवाल का जवाब बहुत गहरा है। अपने आप में पूरा फलसफा समेटे हुए। तुमने कैसे जान लिया के जवाब में मन की शक्ति का अहसास कराता यह जवाब कहता है-मन से आंखों का काम लिया! धार्मिक प्रवचनों से दूर-धार्मिक परिवेश से दूर बैठे दर्शक को पहली बार मन की शक्ति का अहसास इतने संगीतमय और काव्य से भरे इतने मधुर लेकिन बहुत सादगी भरे शब्दों से कराया जाता है-मन से आंखों का काम लिया!
इसके बाद भी गीत अपनी दिलचस्पी को कायम रखता हुआ आगे बढ़ता है। 
लीजिये यह पूरा गीत भी पढ़िए जिसे लिखा था जनाब आनंद बख्शी साहिब ने और संगीत से सजाया था एस.डी. बर्मन साहिब ने। आवाज़ दी थी जनाब मोहम्मद रफ़ी साहिब और सुर साम्राज्ञी  मंगेशकर ने। इस फिल्म के पांच यादगारी गीतों में से इस गीत का जादू कुछ अलग सा ही रहा। 
अब लीजिये इस गीत के यादगारी बोल भी गुनगुनाईये 
तेरे नैनों के मैं दीप जलाऊँगा
अपनी आँखों से दुनिया दिखलाऊँगा


अच्छा?
वो क्या है? इक मंदिर है 
उस मंदिर में? इक मूरत है 
ये मूरत कैसी होती है?
तेरी सूरत जैसी होती है 
वो क्या है? इक मंदिर है 



मैं क्या जानूँ छाँव है क्या और धूप है क्या
रंग-बिरंगी इस दुनिया का रूप है क्या
वो क्या है? इक परबत है 
उस परबत पे? इक बादल है
ये बादल कैसा होता है?
तेरे आँचल जैसा होता है
वो क्या है? इक परबत है



मस्त हवा ने घूंघट खोला, कलियों का 
झूम के मौसम आया है रंगरलियों का 
वो क्या है? इक बगिया है 
उस बगिया में? कई भँवरे हैं
भँवरे क्या जोगी होते हैं?
नहीं, दिल के रोगी होते हैं
वो क्या है? इक बगिया है



ऐसी भी अनजान नहीं मैं अब सजना 
बिन-देखे मुझ को दिखता है सब सजना 
अच्छा?
वो क्या है? वो सागर है 
उस सागर में? इक नैया है
अरे, तूने कैसे नाम लिया?
मन से आँखों का काम लिया
वो क्या है? वो सागर है

बुधवार, 8 जनवरी 2020

शब्द और संगीत का जादू महसूस होता है इस गीत में

ग़ालिब साहिब की ग़ज़ल पर आधारित यह गीत सीधा दिल में उतरता है 
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है?
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?
मैं इसे बचपन की उस उम्र से सुनता आ रहा हूँ जब मुझे न तो उर्दू की समझ थी न ही शायरी या  संगीत की। मेरे मामा ज्ञानी राजिंदर सिंह छाबड़ा (फ़िरोज़पुर) उन दिनों ग्रामोफोन लाए थे। ग्रामोफोन का होना उन दिनों कलाकारों की एक ज़रूरत थी लेकिन बहुत से लोगों के लिए यह स्टेटससिंबल ही बन गया था। मामा जी संगीत के भी अच्छे जानकार थे और शायरी व लेखन में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी।  मैं अक्सर उनके घर के उस कलात्मक माहौल में अक्सर जाता। वहां साधारण सा घर होते हुए भी बहुत कलात्मिक्ता थी। किराए पर तीन घर बदलने के बाद उन्होंने बस स्टैंड के नज़दीक अपना घर बनाया लेकिन उस घर में वह पहले जैसा माहौल कभी न बन पाया। फिर उसी घर में अचानक उनका देहांत हो गया। उम्र बढ़ रही थी सेहत खराब हो रही थी। एक दिन पुरानी किताबों को संभाल रहे थे कि अचानक नज़र कुछ ख़ास किताबों पर पड़ी। शायद उन किताबों को सीलन लग गयी थी। ऊपर की शैल्फ किताबें उतारने लगे तो पूरी अलमारी ऊपर आ गिरी।  शायद किताबों के खराब होने का सदमा कहीं गहरे में लगा था। उसके कुछ देर बाद ही उनका देहांत हो गया। मुझे देर रात खबर आई। सुबह सुबह हम लोग लुधियाना से फ़िरोज़पुर पहुंचे। उनके बच्चों ने यही कहा कि उनको मेरी मां के जाने का गम था। मां का देहांत भी कुछ महीने पहले ही हुआ था। दोनों भाई बहनों का प्रेम भी बहुत था।  न जाने क्या हुआ लेकिन मामा नहीं रहे। उनकी यादों में मिर्ज़ा ग़ालिब की रचनाओं का सुनना भी था। मैं इतना छोटा था कि ग्रामोफोन के रेकॉर्ड पर पड़ने वाली सूई को बहुत देर इस लिए देखता रहता कि गीत की आवाज़ सूई में से निकलती है या इस काले तवे जैसे रेकार्ड में से। जिस रेकार्ड से हम मिर्ज़ा ग़ालिब साहिब की लिखी ग़ज़लें सुनते वे एल पी अर्थात लॉन्ग प्लेयर रेकार्ड हुआ करता था। यह बड़े से गोल तवे जैसा होता और इसमें कई गीत हुआ करते।  इसे लगा कर आप आराम से बैठ सकते या काम कर सकते थे। एक के बाद एक गीत लगातार बजते रहते। जिस गीत की चर्चा कर रहे थे वह वास्तव में जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब साहिब की लिखी रचना ही थी।  इसे गीत के रूप में ढाल कर "मिर्ज़ा ग़ालिब" नाम की फिल्म में ही सजाया गया था। यह फिल्म 1954 में आई थी। इसे अपनी आवाज़ दी थी सुरैया और जनाब तलत महमूद साहिब ने। संगीत दिया थे जनाब गुलाम मोहम्मद साहिब ने। सुरैया ने इसी फिल्म में अदाकारी भी की थी।  भारतभूषण, दुर्गा खोते, सआदत अली, उल्हास और कई अन्य मंजे हुए कलाकार। फिल्म निर्देशक थे सोहराब मोदी और निर्माता थे मिनर्वा मूवीटोन बैनर। संगीतकार जनाब गुलाम मोहम्मद साहिब की चर्चा हम किसी अलग पोस्ट में भी कर रहे हैं। फिलहाल आप सुनिए/पढ़िए वह लोकप्रिय गीत/ग़ज़ल--दिल-ए-नादां तुझे हुआ  क्या है!  
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है?
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है?
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है?
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है?
मैं भी मुँह में ज़ुबान रखता हूँ
मैं भी मुँह में ज़ुबान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दा क्या है
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है?
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है?
जान तुम पर निसार करता हूँ
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है
दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है?
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?
मिर्ज़ा ग़ालिब साहिब की ग़ज़ल पर आधारित यह चर्चा आपको कैसी लगी। इसका ज़िक्र आपको यहाँ सब कैसा लगा अवश्य बताएं। यदि आपके मन में भी इसी तरह कोई गीत/ग़ज़ल या फिल्म छुपे हुए हों तो अवश्य उनकी चर्चा करें। आपकी  इंतज़ार रहेगी। --रेक्टर कथूरिया  
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मंगलवार, 7 जनवरी 2020

एक कहानी जो आपको नए रंग में रंग देगी

 रिश्तों में छुपी रूहानियत और पावन इश्क का अहसास 
इस कोलाज में जो डिनर की तस्वीर दिख रही है वह धन्यवाद सहित ली गई है आर जे Danish Sait की फेसबुक वाल से 
अतीत की दुनिया: 7 जनवरी 2020: (पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::
आल इण्डिया रेडियो की उर्दू सर्विस कभी बेहद मकबूल थी। इस सर्विस ने दोस्तों का एक नया नेटवर्क बनाया था। समाज को  बहुत ही शानदार भूमिका निभाई।  टीवी की लोकप्रियता तक भी उर्दू सर्विस छाई रही। इसी में एक प्रग्राम होता था रात को साढ़े बजे (10:30)  से लेकर सवा ग्यारह (11:15) बजे तक। दिल और दिमाग में आज तक जगह बना कर मौजूद उस प्रोग्राम का नाम था-तामील-इ-इरशाद।  हम लोग छोटा सा रेडिओ अपनी अपनी रजाई में छुपाकर पुराने गीत सुना करते। इस प्रोग्राम को पेश करने वालों की टीम भी बहुत शानदार थी।  दिलों में उतरती बातों के ज़रिये इन सभी से एक अलग सा रिश्ता भी था। एक बार रेडिओ स्टेशन के परिसर में जनाब शमीम कुरैशी साहिब से मुलाकात हुई। हम सभी उनके फैन थे। बहुत अच्छा चुनाव होता था उनके गीतों का। एक गीत को दुसरे गीत के साथ  लिंकिंग के शब्द भी कमल के हुआ करते थे। एक दिन शाम की चाय पीते उनसे पूछा आप ने कभी सच में भी इश्क किया है? झट से मुस्करा कर बोले हाँ किया है-अपनी मां से किया सबसे पहला इश्क। उसी अहसास से पता चला कि इश्क कितना रूहानी और पावन होता है। आज एक कहानी को  थो शम्मी साहिब याद आ गये। यह कहानी किसी मित्र ने बहुत पहले भेजी थी लेकिन सम्पादन के लिए पेंडिंग पड़ी सामग्री में से आज सामने आई। देखिये-पढ़िए और बताइये इसे पढ़ कर मन में क्या आया! --रेक्टर कथूरिया
एक दिन अचानक मेरी पत्नी मुझसे बोली - "सुनो, अगर मैं तुम्हे किसी और के साथ डिनर और फ़िल्म के लिए बाहर जाने को कहूँ तो तुम क्या कहोगे"।
मैं बोला-" मैं कहूँगा कि अब तुम मुझे प्यार नहीं करती"।
उसने कहा-"मैं तुमसे प्यार करती हूँ, लेकिन मुझे पता है कि यह औरत भी आपसे बहुत प्यार करती है और आप के साथ कुछ समय बिताना उनके लिए सपने जैसा होगा"।

वह अन्य औरत कोई और नहीं मेरी माँ थी। जो मुझ से अलग अकेली रहती थी। अपनी व्यस्तता के कारण मैं उन से मिलने कभी कभी ही जा पाता था।

मैंने माँ को फ़ोन कर उन्हें अपने साथ रात के खानेे और एक फिल्म के लिए बाहर चलने के लिए कहा।

"तुम ठीक तो हो,ना। तुम दोनों के बीच कोई परेशानी तो नहीं" माँ ने पूछा

मेरी माँ थोडा शक्की मिजाज़ की औरत थी। उनके लिए मेरा इस किस्म का फ़ोन मेरी किसी परेशानी का संकेत था।
" नहीं कोई परेशानी नहीं। बस मैंने सोचा था कि आप के साथ बाहर जाना एक सुखद अहसास होगा" मैंने जवाब दिया और कहा 'बस हम दोनों ही चलेंगे"।

उन्होंने इस बारे में एक पल के लिए सोचा और फिर कहा, 'ठीक है।'

शुक्रवार की शाम को जब मैं उनके घर पर पहुंचा तो मैंने देखा है वह भी दरवाजे पर इंतजार कर रही थी। वो एक सुन्दर पोशाक पहने हुए थी और उनका चहेरा एक अलग सी ख़ुशी में चमक रहा था।

कार में माँ ने कहा " 'मैंने अपनी friends को बताया कि मैं अपने बेटे के साथ बाहर खाना खाने के लिए जा रही हूँ। वे काफी प्रभावित थी"।

हम लोग माँ की पसंद वाले एक रेस्तरां पहुचे जो बहुत सुरुचिपूर्ण तो नहीं मगर अच्छा और आरामदायक था। हम बैठ गए, और मैं मेनू देखने लगा। मेनू पढ़ते हुए मैंने आँख उठा कर देखा तो पाया कि वो मुझे ही देख रहीं थी और एक उदास सी मुस्कान उनके होठों पर थी।

'जब तुम छोटे थे तो ये मेनू मैं तुम्हारे लिए पढ़ती थी' उन्होंने कहा।

'माँ इस समय मैं इसे आपके लिए पढना चाहता हूँ,' मैंने जवाब दिया।

खाने के दौरान, हम में एक दुसरे के जीवन में घटी हाल की घटनाओं पर चर्चा होंने लगी। हम ने आपस में इतनी ज्यादा बात की, कि पिक्चर का समय कब निकल गया हमें पता ही नही चला।

बाद में वापस घर लौटते समय माँ ने कहा कि अगर अगली बार मैं उन्हें बिल का पेमेंट करने दूँ, तो वो मेरे साथ दोबारा डिनर के लिए आना चाहेंगी।
मैंने कहा "माँ जब आप चाहो और बिल पेमेंट कौन करता है इस से क्या फ़र्क़ पड़ता है।
माँ ने कहा कि फ़र्क़ पड़ता है और अगली बार बिल वो ही पे करेंगी।

"घर पहुँचने पर पत्नी ने पूछा" - कैसा रहा।
"बहुत बढ़िया, जैसा सोचा था उससे कही ज्यादा बढ़िया" - मैंने जवाब दिया।

इस घटना के कुछ दिन बाद, मेरी माँ का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। यह इतना अचानक हुआ कि मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पाया ।

माँ की मौत के कुछ समय बाद, मुझे एक लिफाफा मिला जिसमे उसी रेस्तरां की एडवांस पेमेंट की रसीद के साथ माँ का एक ख़त था जिसमे माँ ने लिखा था " मेरे बेटे मुझे पता नहीं कि मैं तुम्हारे साथ दोबारा डिनर पर जा पाऊँगी या नहीं इसलिए मैंने दो लोगो के खाने के अनुमानित बिल का एडवांस पेमेंट कर दिया है। अगर मैं नहीं जा पाऊँ तो तुम अपनी पत्नी के साथ भोजन करने जरूर जाना।
उस रात तुमने कहा था ना कि क्या फ़र्क़ पड़ता है। मुझ जैसी अकेली रहने वाली बूढी औरत को फ़र्क़ पड़ता है, तुम नहीं जानते उस रात तुम्हारे साथ बीता हर पल मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन समय में एक था।
भगवान् तुम्हे सदा खुश रखे।
I love you".
तुम्हारी माँ

उस पल मुझे अपनों को समय देने और उनके प्यार को महसूस करने का महत्त्व मालूम हुआ।

रविवार, 5 जनवरी 2020

बचपन से ले कर अब बुढ़ापे तक क्यों है मुझे इस गीत से लगाव?

मेरा जन्म 1958 का और यह फिल्म रिलीज़ हुई थी सन 1964 में 
तेरी आँख के आंसू पी जाऊं-ऐसी मेरी तक़दीर कहां ! यह गीत मुझे बचपन से ही पसंद था। जब भी रेडियो पर यह गीत आता मैं सब काम छोड़ कर इसे सुनता।मेरा जन्म मार्च 1958 का है और यह फिल्म आई थी सन 1964 में। अर्थात मैं उस समय महज़ छह वर्ष की उम्र का था।
गीत अक्सर ही फिल्म रिलीज़ होने से बहुत पहले गूंजने लगते थे सो यह गीत भी बहुत पहले आ गया था। न तो मुझे इसके शब्दों का पूरा पता था और न ही इसके अर्थ मालुम होते थे। फिल्म का भी कुछ पता न था लेकिन इस एक पंक्ति का अर्थ मालूम था कि कोई किसी के आंसू पीने की बात कह रहा है। इस फिल्म ने उन दिनों 11 मिलियन भारतीय रूपये कमाए थे। उस समय में यह बहुत बड़ी रकम थी। उन दिनों मुझे उस कमाई का भी कुछ पता न चला। चल जाता तो शायद मैं भी उसी तरह की कमाई की बात सोचता। पता भी चला तो बस आंसूयों का। मुझे उस उम्र में भी बहुत से आंसू बहाने पड़े थे शायद उन आंसूयों ने ही यह समझ दे दी कि इस गीत के मुखड़े को समझ सकूं। आंसूओं का एक रिश्ता सा बन गया था इस गीत के साथ।
इस गीत के गीतकार रजिंदर कृष्ण दुग्गल गीत में छुपे दर्द के अहसास के कारण अपने अपने से लगने लगे। इसके साथ ही संगीतकार मदनमोहन साहिब के साथ भी एक दिल का रिश्ता स्थापित हुआ। मुझे अफ़सोस रहेगा कि इन दोनों से मैं अब तक नहीं मिल पाया। माला सिन्हा और तलत महमूद साहिब से भी भेंट नहीं हो सकी। निर्देशक थे विनोद कुमार और संगीत दिया था मदन मोहन साहिब ने।  मदन मोहन साहिब का 14 जुलाई 1975 को निधन हो गया और गीतकार रजिंदर कृष्ण 23 सितंबर 1987 को सिर्फ 68 वर्ष की उम्र में चल बसे। इन दोनों से कभी न मिल पाने के सदमे ने मुझे समझाया कि आर्थिक मजबूरियां कितना कुछ छीन लेती हैं। गीतकार जनाब राजेंद्र कृष्ण और इस सदा बहार गीत को आवाज़ देने वाले जनाब तलत महमूद साहिब के संयोजन ने इस गीत को भी अमर कर दिया। भारत भूषण, माला सिन्हा, शशि कला, पृथ्वी राज कपूर, ॐ प्रकाश, सुंदर अरुणा ईरानी, रणधीर, मीनू मुमताज़ और फरीदा जलाल जैसे मंजे हुए कलाकारों ने इस फिल्म में जान फूंक दी थी। उनकी आवाज़ में महसूस होता कंपन एक अजीब सा अहसास कराता है। गीत के शब्दों का दर्द उस कंपन के कारण शायद ज़्यादा महसूस होता है। यह कंपन ही उनकी आवाज़ को विलक्षण बनाता है। 
यहाँ पूरा गीत भी दिया जा रहा है। जब गीत की पहली पंक्ति कानों में पड़ती है या शब्दों में दिखाई देती है तो वह पहली पंक्ति ज़िंदगी की मजबूरियों को बहुत ही सादगी से प्रस्तुत करती है;सामने है। वह पहली पंक्ति कहती है:
तेरा ग़मख़्वार हूँ लेकिन मैं तुझ तक आ नहीं सकता----और दूसरी पंक्ति इसी शिद्द्त को आगे बढ़ाती है--मैं अपने नाम तेरी बेकसी लिखवा नहीं सकता---कितना अजीब सा अहसास है--कितनी सूक्ष्म सी पकड़ है। जब लोग ज़मीन जायदादों को अपने  नाम करवाने के इलावा और कुछ नहीं सोचते और इस मकसद के लिए कत्लोगार्त तक कर डालते हैं उस माहौल में भी कोई किसी की बेकसी अपने नाम लिखवाने की चाह में है। एक बार इस गीत की इस पंक्ति को मैंने अपने वाटसप पर लिख लिया। इसे देख कर एक महिला मित्र ने सवाल किया--किस के आंसू पीना चाहते हो? सवाल सुन कर बहुत अजीब भी लगा पर झट से कह दिया मैडम आपके आंसू? वह बोली सच? मैंने कहा हां  बिलकुल सच। मैं उसके कितने आंसू पी पाया और कितने नहीं यह एक अलग कहानी है। इसकी चर्चा कभी फिर सही। फ़िलहाल आप पढ़िए//देखिये और सुनिए देखिये इस गीत को जो आज भी मुझे से जुड़ा हुआ है। 
तेरा ग़मख़्वार हूँ लेकिन मैं तुझ तक आ नहीं सकता
मैं अपने नाम तेरी बेकसी लिखवा नहीं सकता

तेरी आँख के आँसू पी जाऊं ऐसी मेरी तक़दीर कहाँ 
तेरे ग़म में तुझको बहलाऊं ऐसी मेरी तक़दीर कहाँ

ऐ काश जो मिल कर रोते, कुछ दर्द तो हलके होते
बेकार न जाते आँसू, कुछ दाग़ जिगर के धोते
फिर रंज न होता इतना, है तनहाई में जितना
अब जाने ये रस्ता ग़म का, है और भी लम्बा कितना
हालात की उलझन सुलझाऊँ ऐसी मेरी तक़दीर कहाँ
तेरी आँख के आँसू पी जाऊँ-----
आपको यह ब्लॉग कैसा लगा? यह गीत और इसका संगीत कैसा लगा? इस गीत के साथ मेरे इस लगाव की बात कैसी लगी?  क्या आपको भी कभी किसी गीत के साथ ऐसा ही लगाव हुआ? हुआ तो अवश्य बताना। इंतज़ार रहेगी ही। अगली पोस्ट में मैं बता सकूंगा किसी ऐसे ही गीत के बारे में जिस को लेकर मुझे परिवार और बिरादरी में बहुत से सवाल भी हुए। इस गीत की चर्चा भी जल्दी ही। ---रेक्टर कथूरिया (पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)