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सोमवार, 21 दिसंबर 2020

किसने सामने रखी हैं दोनों कौमों की सबसे बदसूरत तस्वीरें

 Monday: 21st December 2020 at 02:18 PM

श्याम मीरा सिंह बहुत खूबसूरत अंदाज़ में कर रहे हैं खुलासा


दिल्ली से हैदराबाद के सफर में हूं. वेटिंग लिस्ट की वजह से टिकट कैंसिल हो गई थी तो सीट नहीं मिली। दिल्ली से हैदराबाद के बीच 1680 किमी का रास्ता है, घण्टों में नापें तो 27 से 28 घन्टें। एक आदमी के लिए इतनी देर खड़े रहना मुश्किल है। बैठना भी। मैं स्लीपर क्लास की दस नंबर की बोगी में चढ़ गया। थोड़ा सकुचाने वाला स्वभाव है तो किसी की भी सीट पर नहीं बैठा, खड़ा ही रहा। एक शख्स जिसकी नजर बार-बार मुझपर पड़ रही थी ने मुझे अपनी सीट ऑफर की। मेरा नाम नहीं पूछा, मजहब भी नहीं। बातचीत के दौरान पता चला कि वह बंगलौर (कर्नाटक) जा रहे हैं।

इस बार श्याम मीरा सिंह के संस्मरण 
मैंने भी बताया कि मेरे पास 900 रुपए की टिकट है लेकिन सीट नहीं है, तो मुझे टोकते हुए उसने कहा कि "ये सीट है तो सही आप इसपर ही मेरे साथ सो जाना।" आगे उसने कहा लेकिन एक छोटी सी समस्या होगी कि मेरे अब्बू जोकि हार्ट के पेशेंट हैं वह भी नागपुर स्टेशन से साथ में होने वाले हैं उनकी भी सीट कन्फर्म नहीं हुई है। इसलिए उनके आने के बाद कुछ एडजस्टमेंट करना पड़ेगा।

मतलब कुछ-कुछ ईशारा यही कुछ था कि सीट छोड़नी पड़ेगी। रास्ते भर उसने मुझे खाने-पीने के सभी सामानों में बराबरी पर रखा। पानी, बिस्कुट, संतरें, काजू मठरी, लंच। सबमें आधा-आधा। सफर लम्बा था सीट छोटी। समस्या स्वभाविक रूप से उसे हुई ही होगी। लेकिन उसने एडजस्ट किया। करीब 16 घन्टे के सफर के बाद नागपुर स्टेशन भी आ ही गया। अब्बू चूंकि हर्ट के पेशेंट और उमर में बुजुर्ग थे,उनकी व्यवस्था करना पहली प्राथमिकता थी। मैंने समय की नजाकत को समझते हुए खुद को उस सीट से अलग करना जरूरी समझा और इधर उधर खड़ा होने लगा। एक चादर नुमा बिस्तर अगल-बगल की सीटों के ठीक बीच वाली जमीन पर लगा लिया गया। मैं वहां से कहीं और जाने के लिए अपना बैग संभालने लगा, इधर उधर पड़ा सामान रखने लगा। तभी उस बुजुर्ग ने कहा कि आप कहां जा रहे हैं, मैंने जवाब दिया कि "मैं इधर उधर ही कहीं देखता हूं, वैसे भी मैं दिन में सो ही लिया हूं सो अब सोने की अधिक आवश्यकता नहीं रही है, आप थोड़ा आराम करिए सीट पर, सर्दी भी अधिक है।"
ये दोनों शख्स मेरा मजहब नहीं जानते थे, मेरी जाति नहीं जानते थे। अगर मेरे लिबास से अंदाजा भी लगाते तो हिन्दू ही मालूम पड़ता। लेकिन उनके लिबास और दाढ़ी से साफ मालूम चल रहा था कि वो लोग मुस्लिम हैं, बिना मूछ, लंबी दाढ़ी, कुर्ता पैजामा, और एक अलग ही तरह का लहजा, बोली भारत में एक मुसलमान की पहचान करने के लिए यही काफी है. उन अंकल का नाम याद नहीं लेकिन उस लड़के का नाम याद है, सैय्यद वसीम।
मुझसे उम्र में कुछ साल बड़े सैयद ने मेरी मदद की, यह नेकदिली थी लेकिन सामान्य बात थी, लेकिन उसके अब्बू ने जो कहा वह मुझे और इस देश के तमाम लोगों को शर्म और फक्र दोनों का अहसास एक साथ कराने वाली चीज थी, शर्म उनके लिए जो मुसलमानों के लिबास देखकर ही मन में पूर्वाग्रह भर लाते हैं। फक्र उनके लिए जिन्हें इस मुल्क की साझी विरासत पर नाज है। लंबी सफेद दाड़ी वाले उस बुजुर्ग ने कहा कि उनका बेटा ज़मीन पर सो जाएगा और मैं उनके साथ सीट पर लेट जाऊं। इसीलिए जमीन पर चादर बिछाई गई है। शीत लहर के मौसम में अपने बेटे को जमीन पर सोने के लिए कहना, और एक अनजान को अपनी सीट पर जगह देने की बात का नाम ही "हिन्दोस्तां" हैं। यही वह हिन्द है जिसने विश्व के तमाम देशों को अपनी समृद्धि, संस्कृति से जलने को मजबूर किया। ऐसे अनेकों उदाहरण दिन-रात यूं ही मिल जाएंगे, यहां इत्तेफाक से मुस्लिम थे, कहीं मदद करने वाले हिन्दू होते हैं और सामने वाला मुसलमान। इन सबसे मिलकर भारत बनता है। हिन्दुस्तां वह नहीं जो टीवी पर फुटेज दिखा दिखा कर जताया जा रहा है। हिन्दुस्तां वह है जो असल जिंदगी में एक ही मुल्क में एक हवा से सांस ले रहा है।
हिंदुओं के एक बड़े तबके में मुसलमानों के लिए अजीब तरह की घृणा है, यही घृणा मुसलमानों के भी एक तबके में हिंदुओं के लिए है। लेकिन घृणा उन्हीं लोगों के मन मे है जो एक दूसरे समुदाय के लोगों से कभी मिले नहीं, दोस्ती नहीं की। घर पर नहीं गए, स्कूल में साथ नहीं घूमे, प्रेमी नहीं बने, प्रेमिकाएं नहीं बनाईं, आधे से ज्यादा हिंदुओं ने व्हाट्सएप वाला मुसलमान ही देखा है। जिसकी लंबी सी दाड़ी है-हाथ में चाकू है। जेब में बम है। उसे मदद करने वाले हाथ और मोहब्बत वाला दिल देखने को कभी नहीं दिखता। क्योंकि उसको तस्वीर ही एक ही रंग की भेजी जा रही हैं, मुसलमान से उसकी पहली मुलाकात ही इंटरनेट पर हुई थी। कुरान भी उसने आरएसएस के व्हाट्सएप ग्रुप पर पढ़ी है। आज से 4 साल पहले मैं भी मुसलमानों के प्रति इन्हीं पूर्वाग्रहों में जीता था। मुस्लिम क्षेत्र से निकलते वक्त कदमों की गति जल्दी जल्दी बढ़ती जाती थी। उन्हें देखते ही अजीब तरह का शक, डर और घृणा एक साथ आती थी। लेकिन तभी तक जब तक कि मैं असल में मुसलमानों से नहीं मिला, दोस्ती नहीं की। आज मेरे तमाम दोस्त इस मजहब के मानने वाले हैं। मैंने अपने भाई को अपने मुसलमान दोस्तों में पाया है। आज मैं जामा मस्जिद में नमाज पढ़ रही भारी भीड़ में भी अकेले चला जाता हूं लेकिन कभी नहीं लगा कि ये मस्जिद वाली भीड़ मंदिर वाली भीड़ से थोड़ी सी भी अलग हैं, वह उतने ही भावुक हैं जितने कि हिन्दू, वह उतने ही मजहबी हैं जितने कि हिन्दू, वह उतनी ही मेहमानबाजी जानते हैं जितने कि और मजहबों के लोग। आरएसएस और भाजपा की सफलता का एक ही कारण है कि उसने दोनों कौमों की सबसे बदसूरत तस्वीरें आपके बीच रखी हैं, नहीं तो इस मुल्क से अच्छा मुल्क नहीं, हिन्दू से अच्छा पड़ौसी नहीं, मुसलमान से अच्छा दोस्त नहीं।
मेरे संस्मरण (श्याम मीरा सिंह की फेसबुक प्रोफ़ाईल से साभार)

गुरुवार, 12 मार्च 2020

जिस दिन मेरा जन्म हुआ उस दिन सब कैसा था?

मुझे उन पलों की धुंधली सी याद भी नहीं है
Credit: ESO/Spitzer/NASA/JPL/S. Kraus
सोशल मीडिया//लुधियाना: 12 मार्च 2020: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी):: जन्म के अतीत में 
ओशो ने इस संबंध में बहुत कुछ विस्तार से कहा है 
ख़ास ग्रुप 
जन्म का दिन कैसा था मुझे नहीं याद। उस समय दिन की रौशनी थी या रात्रि का अन्धेरा था मुझे यह भी नहीं मालूम। हवा रुकी हुई थी या चल रही थी यह भी नहीं पता। मौसम में ठंडक थी या गर्मी यह भी नहीं जान सका मैं। मुझे उन पलों की धुंधली सी याद भी नहीं है। शायद मुझे उस समय इतनी होश नहीं थी कि इसे देख या समझ पाता।  जिनको यह सारी होश थी उनसे बहुत बार पूछा लेकिन उन सभी ने मेरे सवालों को हंस कर टाल दिया।  उनकी नज़र में मेरे यह सभी सवाल फ़िज़ूल थे। हालांकि विश्व में ऐसे धर्म और ऐसी प्रजातियाँ हैं जो अतीत में जाने के प्रयास करती भी हैं और करवाती भी हैं लेकिन उनके सम्पर्क में भी बहुत कम लोग जा पाते हैं। बहुसंख्या तक यह पहुंच होनी भी नहीं चाहिए क्यूंकि ज़्यादातर लोगों को इसकी समझ भी नहीं आने वाली। मेरे यह सवाल मेरी नजर में महत्वपूर्ण थे। बिलकुल उसी तरह जैसे कैमरा क्लिक करने के वक्त हम रौशनी को देखते हैं। विपरीत दिशा से आ रही रौशनी सारी मेहनत बेकार कर देती है। अच्छी भली फोटो खराब हो जाती है। जब कुछ दशक पहले फोटो खींचने के लिए रील का प्रयोग होता था तो फोटो खींचने के बाद उसे धुलवाना पड़ता था। इस काम के लिए बाकायदा स्टुडियो का एक हिस्सा डार्क रूम हुआ करता था जहाँ रौशनी बहुत ही कम होती थी। जब फिल को धोया जाता था तो उस समय वह रौशनी भी बंद कर दी जाती थी। इसी प्रक्रिया पर निर्भर करती थी फोटो की क्वालिटी। अतीत में जाने की प्रक्रिया कुछ पता देती है हमारे जन्म के विज्ञान का। हम कहाँ चूक गए? हम क्या ले कर आये। अब जिंदगी भर हमारे साथ क्या रहने वाला है? जिन परिणामों के साथ हम बंध गए उन्हें कैसे सुधारा जा सकता है? इसका एक विज्ञान है जिसके साथ निरंतर अन्याय हो रहा है। जो इसका अंधाधुंध विरोध है उनके हाथों भी और जो इसे समझने की बजाये अंधाधुध माने चले जा रहे हैं उनके हाथों भी। ओशो ने इस सम्बन्ध में भी बहुत कुछ कहा है जो अनमोल है। मुझे यह सब याद आया फेसबुक पर अपनी ही एक तस्वीर देख कर जिसे पोस्ट किया देविंदर बिमरा जी ने।  मेरे जन्मदिन के मौके पर उन्होंने इस तस्वीर पर हैपी बर्थडे भी लिखा। इस ग्रुप में लेखकों को जन्मदिन मुबारक कहने का यह अनूठा अंदाज़ बहुत ही लोकप्रिय हुआ है। जन्मदिन की इसी बधाई  के बहाने बहुत से लेखकों की तस्वीरें इसी एक मंच में एकत्र हो चुकी हैं जो अन्य लेखकों के लिए भी बहुत ही फायदेमंद हैं। ज़रूरत पड़े तो झट से तस्वीर हाज़िर। 
रेक्टर कथूरिया 
इस तरह साहित्य पर सक्रिय मीडिया के लिए यह बहुत ही अच्छा ग्रुप है।हिंदी पंजाबी के लेखकों की तस्वीरें इसी ग्रुप में संग्रहित करने का मुश्किल काम करते हैं देविंदर बिमरा जी। इस मंच पर बहुत से लेखकों की तस्वीरें हैं जिनमें उन लेखकों का चेहरा होता ही है। उस चेहरे में एक झलक भी होती है जो उनकी ज़िंदगी का पता देती है। जो कुछ अक्सर हम छुपा लेते हैं उसका भी इशारा सा करती है। हमारी उपलब्धियों के साथ साथ हमारी बेबसियों और मजबूरियों का भी संकेत करती है। साकार हुए सपनों के साथ साथ टूट गए या अधूरे रह गए सपनों की भी बात करती हैं। अधूरी बात और प्यास का भी पता देती हैं। हमने जो जो नशा कहीं छुप कर किया होगा उसका भी पता देती है। अगर किसी को ठगने के प्रयास छुप कर भी  तो उनका भी पता मिलता है। कुल मिला कर हमारा चेहरा सचमुच एक किताब ही तो होता है। यह बात अलग है उसे हर कोई न तो पढ़ सकता है और न ही पढ़ना चाहता है। हमारी तमाम कोशिशें, हमारे सभी प्रयास, हमारी सभी चालाकियां, हमारी हर बात  उसमें नज़र आ ही जाती है। इसके साथ ही वह दर्द भी दिखने लगता है जिसे हमने अकेले में सहा। जिसका पता हमने किसी को भी न लगने दिया। बहुत  तस्वीर में छुपा चेहरा। हम बहुत कुछ बदलना चाहते हैं; अपना भी और अपने मित्रों का भी लेकिन कर कुछ नहीं पाते। लेकिन हमें कोशिश तो करनी ही चाहिए। शायद सफलता मूल ही जाये। बहुत से लोगों को मिलती भी है। 
हम अकेले शायद बहुत कुछ न भी बदल सकते हों लेकिन मिलजुल कर एक दुसरे के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। जिस दिन सांसों की डोर  टूट जाएगी  न किसी को हैपी बर्थडे कहा जा सकेगा न ही सुना जा सकेगा। जब तक सांस चलती है तब तक हम ऐसे अवसरों को मनाते रहें। शायद किसी को अपने पहले जन्मदिन का वह सब कुछ याद आ जाये जो उसे पता होता तो कितना अच्छा होता। कुल मिला कर यह एक अच्छा प्रयास है जिसमें हमें सक्रिय रूप से जुड़ना चाहिए। 
                                                         -रेक्टर कथूरिया (पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

एक कहानी जो आपको नए रंग में रंग देगी

 रिश्तों में छुपी रूहानियत और पावन इश्क का अहसास 
इस कोलाज में जो डिनर की तस्वीर दिख रही है वह धन्यवाद सहित ली गई है आर जे Danish Sait की फेसबुक वाल से 
अतीत की दुनिया: 7 जनवरी 2020: (पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::
आल इण्डिया रेडियो की उर्दू सर्विस कभी बेहद मकबूल थी। इस सर्विस ने दोस्तों का एक नया नेटवर्क बनाया था। समाज को  बहुत ही शानदार भूमिका निभाई।  टीवी की लोकप्रियता तक भी उर्दू सर्विस छाई रही। इसी में एक प्रग्राम होता था रात को साढ़े बजे (10:30)  से लेकर सवा ग्यारह (11:15) बजे तक। दिल और दिमाग में आज तक जगह बना कर मौजूद उस प्रोग्राम का नाम था-तामील-इ-इरशाद।  हम लोग छोटा सा रेडिओ अपनी अपनी रजाई में छुपाकर पुराने गीत सुना करते। इस प्रोग्राम को पेश करने वालों की टीम भी बहुत शानदार थी।  दिलों में उतरती बातों के ज़रिये इन सभी से एक अलग सा रिश्ता भी था। एक बार रेडिओ स्टेशन के परिसर में जनाब शमीम कुरैशी साहिब से मुलाकात हुई। हम सभी उनके फैन थे। बहुत अच्छा चुनाव होता था उनके गीतों का। एक गीत को दुसरे गीत के साथ  लिंकिंग के शब्द भी कमल के हुआ करते थे। एक दिन शाम की चाय पीते उनसे पूछा आप ने कभी सच में भी इश्क किया है? झट से मुस्करा कर बोले हाँ किया है-अपनी मां से किया सबसे पहला इश्क। उसी अहसास से पता चला कि इश्क कितना रूहानी और पावन होता है। आज एक कहानी को  थो शम्मी साहिब याद आ गये। यह कहानी किसी मित्र ने बहुत पहले भेजी थी लेकिन सम्पादन के लिए पेंडिंग पड़ी सामग्री में से आज सामने आई। देखिये-पढ़िए और बताइये इसे पढ़ कर मन में क्या आया! --रेक्टर कथूरिया
एक दिन अचानक मेरी पत्नी मुझसे बोली - "सुनो, अगर मैं तुम्हे किसी और के साथ डिनर और फ़िल्म के लिए बाहर जाने को कहूँ तो तुम क्या कहोगे"।
मैं बोला-" मैं कहूँगा कि अब तुम मुझे प्यार नहीं करती"।
उसने कहा-"मैं तुमसे प्यार करती हूँ, लेकिन मुझे पता है कि यह औरत भी आपसे बहुत प्यार करती है और आप के साथ कुछ समय बिताना उनके लिए सपने जैसा होगा"।

वह अन्य औरत कोई और नहीं मेरी माँ थी। जो मुझ से अलग अकेली रहती थी। अपनी व्यस्तता के कारण मैं उन से मिलने कभी कभी ही जा पाता था।

मैंने माँ को फ़ोन कर उन्हें अपने साथ रात के खानेे और एक फिल्म के लिए बाहर चलने के लिए कहा।

"तुम ठीक तो हो,ना। तुम दोनों के बीच कोई परेशानी तो नहीं" माँ ने पूछा

मेरी माँ थोडा शक्की मिजाज़ की औरत थी। उनके लिए मेरा इस किस्म का फ़ोन मेरी किसी परेशानी का संकेत था।
" नहीं कोई परेशानी नहीं। बस मैंने सोचा था कि आप के साथ बाहर जाना एक सुखद अहसास होगा" मैंने जवाब दिया और कहा 'बस हम दोनों ही चलेंगे"।

उन्होंने इस बारे में एक पल के लिए सोचा और फिर कहा, 'ठीक है।'

शुक्रवार की शाम को जब मैं उनके घर पर पहुंचा तो मैंने देखा है वह भी दरवाजे पर इंतजार कर रही थी। वो एक सुन्दर पोशाक पहने हुए थी और उनका चहेरा एक अलग सी ख़ुशी में चमक रहा था।

कार में माँ ने कहा " 'मैंने अपनी friends को बताया कि मैं अपने बेटे के साथ बाहर खाना खाने के लिए जा रही हूँ। वे काफी प्रभावित थी"।

हम लोग माँ की पसंद वाले एक रेस्तरां पहुचे जो बहुत सुरुचिपूर्ण तो नहीं मगर अच्छा और आरामदायक था। हम बैठ गए, और मैं मेनू देखने लगा। मेनू पढ़ते हुए मैंने आँख उठा कर देखा तो पाया कि वो मुझे ही देख रहीं थी और एक उदास सी मुस्कान उनके होठों पर थी।

'जब तुम छोटे थे तो ये मेनू मैं तुम्हारे लिए पढ़ती थी' उन्होंने कहा।

'माँ इस समय मैं इसे आपके लिए पढना चाहता हूँ,' मैंने जवाब दिया।

खाने के दौरान, हम में एक दुसरे के जीवन में घटी हाल की घटनाओं पर चर्चा होंने लगी। हम ने आपस में इतनी ज्यादा बात की, कि पिक्चर का समय कब निकल गया हमें पता ही नही चला।

बाद में वापस घर लौटते समय माँ ने कहा कि अगर अगली बार मैं उन्हें बिल का पेमेंट करने दूँ, तो वो मेरे साथ दोबारा डिनर के लिए आना चाहेंगी।
मैंने कहा "माँ जब आप चाहो और बिल पेमेंट कौन करता है इस से क्या फ़र्क़ पड़ता है।
माँ ने कहा कि फ़र्क़ पड़ता है और अगली बार बिल वो ही पे करेंगी।

"घर पहुँचने पर पत्नी ने पूछा" - कैसा रहा।
"बहुत बढ़िया, जैसा सोचा था उससे कही ज्यादा बढ़िया" - मैंने जवाब दिया।

इस घटना के कुछ दिन बाद, मेरी माँ का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। यह इतना अचानक हुआ कि मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पाया ।

माँ की मौत के कुछ समय बाद, मुझे एक लिफाफा मिला जिसमे उसी रेस्तरां की एडवांस पेमेंट की रसीद के साथ माँ का एक ख़त था जिसमे माँ ने लिखा था " मेरे बेटे मुझे पता नहीं कि मैं तुम्हारे साथ दोबारा डिनर पर जा पाऊँगी या नहीं इसलिए मैंने दो लोगो के खाने के अनुमानित बिल का एडवांस पेमेंट कर दिया है। अगर मैं नहीं जा पाऊँ तो तुम अपनी पत्नी के साथ भोजन करने जरूर जाना।
उस रात तुमने कहा था ना कि क्या फ़र्क़ पड़ता है। मुझ जैसी अकेली रहने वाली बूढी औरत को फ़र्क़ पड़ता है, तुम नहीं जानते उस रात तुम्हारे साथ बीता हर पल मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन समय में एक था।
भगवान् तुम्हे सदा खुश रखे।
I love you".
तुम्हारी माँ

उस पल मुझे अपनों को समय देने और उनके प्यार को महसूस करने का महत्त्व मालूम हुआ।

रविवार, 11 मार्च 2018

"किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार"--हरप्रीत कौर प्रीत

हर गरीब बच्चे तक शिक्षा पहुंचाने में जुटी है प्रीत 
अमृतसर: 11 मार्च 2018: (कार्तिका सिंह//पंजाब स्क्रीन डेस्क टीम)::
जन्मदिन मुबारक 
आज बात करते हैं एक युवा महिला की। मेरा मतलब है लुधियाना की हरप्रीत कौर प्रीत से। हरप्रीत नामधारी सम्प्रदाय से सबंधित है। जीवन में जो कुछ भी बन पायी या बनना चाहती है उसे ठाकुर दलीप सिंह जी की कृपा ही मानती  है।  देखते ही देखते शब्दों की  जादूगरी सीख गयी। मंच से उसकी उसकी आवाज़ सुन कर पाँव ठिठक जाते हैं। उसके मंच संचालन की कला में निखार लगातार जारी है। ठाकुर जी से प्रेरणा पा कर गरीब बच्चों को शिक्षा देना उसका एक मात्र मकसद गया है। घर से कोई अमीर नहीं है।  मध्यवर्गीय परिवार  है लेकिन मकसद बहुत बड़ा शुरू कर लिया। नियत साफ थी-मकसद नेक था और दिल में हिम्मत भी थी। कदम कदम पर सफलता मिलती चली गयी। शेख फरीद जी कहते हैं: अणहोंदे आप वन्डाये-को ऐसा भक्त सदाए। हरप्रीत कौर प्रीत पर इस कथन को सच होते देखा। मन की यह अवस्था सभी के नसीब में नहीं होती। अपनी रोटी की थाली किसी को दे देनी। अपनी शर्ट या जैकेट उतार कर किसी को दे देनी। अपने घर के राशन की चिंता भूल कर किसीके घर का चूल्हा जलाना। सचमुच उस पर कोई रूहानी कृपा है। उसके अंदर की संवेदना उसे चैन नहीं लेने देती। यही सोचती है--किसी का दर्द मिल सके मिल सके तो ले उधार----बेटे का जन्म दिन आया तो सभी से पूछा बताओ  इसे कैसे मनाएं जिससे उसे भी ख़ुशी मिले और साथ ही उसे दुआएं भी मिलें। मुझे उसका सवाल बहुत अच्छा लगा। मैं खुद भी अपना जन्मदिन मनाने में कोई रुचि नहीं रखता।  आकाशवाणी जालंधर में हरभजन सिंह बटालवी हुआ करते थे। बहुत ही नेक इंसान।  साहित्यकार भी थे। एक दिन मैंने कहा चलो आज आपका जन्मदिन है--कहीं चल कर मनाते हैं।  कहने लगे मैं इस तरह नहीं मनाता। फिर उन्होंने एक लम्बी कहानी सुनाई और कहा मैं तो बस इतना ही करता हूं कि कम से कम एक बुरी आदत छोड़ दूं  और एक अच्छी आदत अपना लूं।  पिछले कुछ वर्षों में मैंने बहुत सी बुरी आदतों से छुटकारा पाया है।
अब जब हरप्रीत कौर प्रीत ने अपने बेटे के जन्मदिन को कैसे मनाया जाये का सवाल उठाया तो बहुत कुछ याद आने लगा। महसूस हुआ-शायद बहुत कम लोग ऐसा सोच पाते हैं। निरथर्क किस्म की मस्ती हमारे समाज और लाईफ स्टाईल का हिस्सा बन चुकी है। यह मदहोशी भरी मस्ती हमें कुछ काम की बात सोचने भी नहीं देती। 
जन्मदिन की बात के इस शुभ अवसर पर याद आरही हैं एक और गीत की पंक्तियाँ।
कुछ पाकर खोना है, 
कुछ खोकर पाना है 
जीवन का मतलब तो, 
आना और जाना है----
दो पल के जीवन से, एक उम्र चुरानी है..... 
मुझे लगता है हर जन्मदिन पर हमें खुद भी खुद को समझना चाहिए और दूसरों को भी समझाना चाहिए कि उम्र का एक वर्ष और कम हुआ लेकिन अनुभवों का एक नया अध्याय भी जीवन में जुड़ गया। आओ अनुभव की इस पूंजी को पाकर दो पल के जीवन से उम्र को चुराना सीखें। 

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

जुस्तुजू जिसकी थी उसको तो न पाया हम ने

इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने
फेसबुक: 10 फरवरी 2018: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन)::
सुल्ताना बेगम साहिबा से मुलाकात किसी भी तरह हो--उनके लिखे शब्दों के ज़रिये या फिर आमने सामने या फिर तस्सवुर में--
एक बात पक्की है कि कुछ देर के लिए आप वोह नहीं रहते जो मिलने से पहले थे। 
आपको लगने लगेगा कि आप अपने अनुभव में ज़िंदगी के ज्ञान की असली और अनमोल पूँजी पा कर ही उठे हैं। शगूफा शब्द कहने को शायद किसी हल्के फुल्के अहसास या हंसी की याद दिलाता हो लेकिन सुलताना बेगम जी के लिखे शगूफे ज़िंदगी की भूल चुकी आंतरिक परतों को उघाड़ते हुए अक्सर वहां ले जाते है जहाँ हम जाने के इच्छुक नहीं भी होते। बिलकुल उसी तरह जैसे हमारा बस चले तो हम आईना भी वही लाएं जो हमें हमारी मर्ज़ी की खूबसूरत शक्ल ही दिखाए। सुल्ताना बेगम भी अपने शब्दों से कई बार आईना दिखाती हैं। आज उनके एक पंजाबी शेयर की  पोस्ट पढ़ी:
दिल में वसल-ए-यार की आरज़ू न रही;
कैसे कहूं कि अब कोई आरज़ू न रही। 
इस पोस्ट को पढ़ते ही याद आयी बरसात की रात की क्वाली। ख़ास कर इसकी वो पंक्तियाँ---
मेरे नामुराद जनून का; गर है इलाज कोई तो मौत है;
जो दवा के नाम पे ज़हर दे उसी चारागर की तलाश है। 
यह सब यहाँ इस लिए लिख रहा हूँ तांकि आप सभी को पता चल सके कि सुल्ताना बेगम के शब्दों को पढ़ते पढ़ते इंसान कहाँ से कहाँ जा सकता है। किसी सहरा में भी किसी समुन्द्र में भी। गहरी शांति में भी और किसी तूफानी हालत में भी। लेकिन आप फिलहाल सुनिए//देखिये इस ग़ज़ल को--
जुस्तजु जिसकी थी, उसको तो न पाया हमने;
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने।
फिल्म उमरायो जान 1981 में रलीज़ हुयी थी और इस फिल्म ने एक गंभीर दर्शक वर्ग की पहचान को और मज़बूत किया था। आवाज़ आशा भौंसले की थी, शब्द थे शहरयार के और संगीत से सजाया था ख्याम साहिब ने। समझना मुश्किल था--अब भी मुश्किल ही है कि आप इस को इसके शब्दों की वजह से पसंद करते हैं, इसकी गायन आवाज़ के लिए पसंद करते हैं या फिर इसके संगीत की वजह से। इन तीनों महारथियों का ऐसा संगम बार बार नहीं बनता। 
जुस्तुजू जिसकी थी उसको तो न पाया हम ने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने
तुझ को रुसवा न किया ख़ुद भी पशेमां न हुए
इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हम ने
कब मिली थी कहाँ बिछड़ी थी हमें याद नहीं

जिंदगी तुझ को तो बस ख्वाब में देखा हम ने
ऐ अदा और सुनाये भी तो क्या हाल अपना

उम्र का लंबा सफर तय किया तन्हा हम ने
फ़िल्मी दुनिया की मानी हुयी हस्ती रेखा का स्केच बनाने वाली अंजना वर्मा जी से आप मिल सकते हैं  यहाँ क्लिक करके 

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

ਸ਼ਸ਼ੀਕਾਂਤ ਨੇ ਕੀਤਾ ਹੁਣ ਖੁੱਲੀ ਜੰਗ ਦਾ ਐਲਾਨ ☬ Sikh Voice

ਗ੍ਰਿਫਤਾਰੀ ਦਾ ਖਦਸ਼ਾ ਵੀ ਪ੍ਰਗਟਾਇਆ 
ਸਰਕਾਰਾਂ ਕਹਿੰਦੀਆਂ ਕੁਝ ਤੇ ਕਰਦੀਆਂ ਕੁਝ ਹੋਰ ਹੀ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ--ਸ਼ਸ਼ੀਕਾਂਤ ਸਾਬਕਾ ਡੀਜੀਪੀ 

Courtesy:Sikh Voice//YouTube
06-12-2013 पर प्रकाशित 
ਸਾਬਕਾ ਡੀਜੀਪੀ ਸ਼ਸ਼ੀਕਾਂਤ ਨੂੰ ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ਤੇ ਸਿੱਖ ਸੰਗਤ ਦੇ ਇੱਕ ਹਿੱਸੇ ਨੇ ਬਾਕਾਇਦਾ ਭਾਈ ਦਾ ਦਰਜਾ ਦੇਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਭਾਈ ਦਾ ਸੰਬੋਧਨ ਸਿੱਖ ਜਗਤ ਵਿੱਚ ਬਹੁਤ ਹੀ ਸਨਮਾਣ ਯੋਗ ਰੁਤਬੇ ਵੱਜੋਂ ਜਾਣਿਆ ਹੈ। ਏਸੇ ਸਿੱਖ ਵੋਇਸ ਵੱਲੋਂ ਯੂ ਟਿਊਬ ਤੇ ਇੱਕ ਵੀਡੀਓ ਵੀ ਪੋਸਟ ਕੀਤੀ ਗਈ ਹੈ ਜਿਹੜੀ ਲਗਾਤਾਰ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਦੇਖੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ। ਇਸ ਵੀਡੀਓ ਵਿੱਚ ਇਸ ਸਾਬਕਾ ਉਚ੍ਚ ਅਧਿਕਾਰੀ ਨੇ ਕਈ ਰਾਜ਼ ਖੋਹਲੇ ਹਨ ਅਤੇ ਕਈ ਹੋਰ ਰਾਜ਼ ਖੋਹਲਣ ਦਾ ਸੰਕੇਤ ਵੀ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਸਿੱਖ ਸੰਗਤਾਂ ਨੂੰ ਬਾਦਲਾਂ ਦੇ ਬਾਈਕਾਟ ਦਾ ਸੱਦਾ ਦੇਂਦਿਆਂ ਉਹਨਾਂ ਕਿਹਾ ਕਿ ਸਰਕਾਰਾਂ ਕਹਿੰਦੀਆਂ ਕੁਝ ਹੋਰ ਤੇ ਕਰਦੀਆਂ ਕੁਝ ਹੋਰ ਹੁੰਦੀਆਂ ਹਨ। 
8 ਦਸੰਬਰ 2013 ਨੂੰ ਉਹਨਾਂ ਫੇਸਬੁਕ ਤੇ ਲਿਖਿਆ--
FRIENDS, I HAVE BEEN GETTING CALLS FROM JOURNALISTS & FRIENDS, SOME TELLING ME THAT A CASE HAS BEEN REGISTERED AGAINST ME AND SOME OTHERS ASKING IF IT IS TRUE?
FRANKLY I HAVE NO IDEA.
BUT I AM READY FOR MY ARREST.
IT WILL COME SOONER OR LATER.
JUST ONE THING THAT I WANT TO SAY...
DON'T GET UPSET OR FRUSTRATED IF I GET ARRESTED.
MAINTAIN PEACE AND HARMONY.
MY FIGHT WILL CONTINUE.
I WILL BE BACK SOON.
GOD BLESS ALL.
.....SHASHI KANT