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मंगलवार, 19 जनवरी 2021

बात जोगिंदरपाल पांडे के श्रद्धांजलि कार्यक्रम की

चुनौतियों का सामना करने वाला वह संकल्प कहीं कमज़ोर तो नहीं?


लुधियाना: 19 जनवरी 2021: (मीडिया लिंक रविंद्र//पंजाब स्क्रीन ब्लॉग टीवी)::

उन दिनों को अब कई दशक गुज़र चुके लेकिन उनकी याद आते ही आज भी बदन में एक सिहरन सी  दौड़ जाती है। दिमाग में खौफ का वह माहौल ताज़ा हो जाता है। जिन लोगों ने वे दिन देखे हैं वे आज भी हर उस बात से दूरी बनाए रखना चाहते हैं जिन बातों से वह माहौल बना था। हर तरफ गोली का राज था। बम धमाके भी आम सी बात हो गई थी। घर से निकलते वक़्त इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल सा होता था कि शाम तक घर लौट पाएंगे या नहीं? हर गली हर मोहल्ले में पुलिस की गश्त भी होती थी लेकिन इसके बावजूद ए के 47 वाले अपनी मनमानी कर गुज़रते थे। सियासत की खतरनाक चालें भाईचारे के बटवारे की रेखाओं को गहरी करने में कामयाब हो रहीं थी। लोग इंसानियत से हट कर हिन्दू सिख बन कर सोचने लगे थे। घरों और परिवारों में खौफ छाया रहता था।  उस समय कांग्रेस पार्टी से सबंधित जानेमाने नेता सतपाल मित्तल और जोगिंदर पाल पांडे की जोड़ी अपनी सक्रियता निरंतर बनाए हुए थी। उनकी लोकप्रियता भी शिखर पर थी। उनके मित्रों में हिन्दू भी थे, सिख भी, मुस्लमान भी और ईसाई भी। यह जोड़ी हर गली हर मोहल्ले  में जा कर लोगों को हौंसला देती कि चिंता मत करो हम हैं न आपके साथ!  उनकी महफिलें किसी दरबार से कम न थीं जहाँ आने वाले मेहमानों के लिए हर वक़्त चाय, कॉफी, दाल-रोटी जलपान चलता रहता।  इसी बहाने उस वक़्त के मौजूदा हालात पर चर्चाएं भी चलती रहतीं। .... एक दिन 19 जनवरी का ही दिन था जब अनहोनी हो के रही। 

वरिष्ठ कांग्रेसी निर्दोष भारद्वाज बताते हैं कि उस दिन जोगिंदर पाल पांडे की कार भारत नगर चौंक के नज़दीक ही स्थित पैट्रोल पम्प में आ कर रुकी। श्री पांडे चंडीगढ़ जा रहे थे। पैट्रोल भरवाने के लिए रुके तो कोई न जनता था की यहां हमेशां ही ज़िंदगी को ब्रेक लगने वाली है। पंजाब का वह शेर होनी के जल में फंस चूका था। देखते ही देखते अचानक उसी पैट्रोल पम्प पर ए के 47 वाले लोग भी आ धमके। दिन दहाड़े गोलियों की बरसात हुई और श्री पण्डे को हमसे हमेशां के लिए छीन लिया गया। तब से लेकर कांग्रेस पार्टी गुटबंदियों के बावजूद इस दिन को मनाती आ रही है। इस घटना से जोगिंदरपाल की छवि एक हिन्दू नेता के तौर पर भी गहरी हो कर उभरी। 

आज भी इस दिन को कांग्रेस पार्टी ने बहुत ही आस्था से लुधियाना के कांग्रेस भवन में मनाया। अब जबकि हालात फिर से खतरनाक होने के इशारे दिखाई देने लगे हैं उस समय अतीत का ज़िक्र आवश्यक भी लगने लगा है। जिन लोगों ने उस नाज़ुक दौर में अपनी जान गंवाई तांकि एकता के सिद्धांत को बचाया सके, देश को बचाया जा सके, आपसी भाईचारे को बचाया जा सके; उन्हें याद करना  सिर्फ परिवारों और पार्टी का कर्तव्य ही नहीं बल्कि उन सभी का कर्तव्य  भी है जो उस सोच के साथ सहमत हैं। अब तो पंजाब में कांग्रेस  पार्टी की सत्ता इस लिए यह आयोजन  बहुत बड़े पैमाने पर होना चाहिए था। दिवंगत नेता जोगिंदरपाल पण्डे के बेटे एम एल ए राकेश पण्डे से लोगों को अब अभीबहुत उम्मीदें हैं लेकिन वह न जाने क्यूं निराश से हो कर बैठे हैं। अपने पिता की तरह वह सक्रिय नहीं हो पा रहे। पार्टी और सरकार के हालात चाहे कुछ भी क्यूं न हों। उनमें उनकी कजिन का असर तो दिखना ही  चाहिए। जो बनी बनाई विरासत और रियासत उन्हें जन्म से ही मिली है उनके पिता को तो जन्म में वह भी नहीं मिली थी। उन्होंने सब कुछ अपनी स्ट्रगल से अर्जित किया। राकेश पण्डे को अपनी स्थिति का फायदा उठाना चाहिए। सब कुछ पार्टी पर छोड़ना आज जैसे हालात में उचित भी नहीं कहा जा सकता। आज हर कांग्रेसी को स्वयं पार्टी बन कर बाहर निकलना होगा। अकेले ही यह हिम्मत करनी होगी। देखते ही देखते काफिला बन जाएगा। 

फिर भी जो हो सका पार्टी ने वह किया। जिला कांग्रेस कमेटी (शहरी) के प्रधान अश्वनी शर्मा की अध्यक्षता में कांग्रेस भवन में एक शोक सभा का आयोजन किया गया। इस शोक सभा में स्व. जोगिंदर पाल पांडे को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस दौरान अश्वनी शर्मा ने कहा कि जोगिंदर पाल पांडे ने आतंकवाद के समय पूरी निर्भिकता के साथ कांग्रेस पार्टी को दिशा प्रदान की और अपने जीवन की कुर्बानी दे दी। कई वरिष्ठ कांग्रेसी आए तो सही लेकिन एक औपचारिकता की तरह। लगता है बहुत से लोग वह सब भूल भी गए हैं। अब उन्हें कौन यह गीत सुनाए कि अब याद उन्हें भी कर लो जो लौट के घर न आये! 

हालांकि अश्वनी शर्मा ने कहा कि उनकी कुर्बानी को कांग्रेस कभी भी भूला नहीं सकती। इस मौके पर मेयर बलकार सिंह संधू, सीनियर डिप्टी मेयर शाम सुंदर मल्होत्रा, जिला महिला कांग्रेस कमेटी की प्रधान लीना टपारिया ने भी स्व. जोगिंदर पाल पांडे को श्रद्धांजलि भेंट की। फिर भी रह रह कर यही लगता रहा कि जानेवाले चले जाते हैं और वक़्त की धुल धीरे धीरे सब कुछ भुलाती चली जाती है।  

इस मौके पर सुशील पराशर, कुलवंत सिद्धू, रोशन लाल, दुष्यंत पांडे, बनवारी लाल, हरबंस पनेसर, सोमनाथ बत्रा, विपन सूद, अरूणा टपारिया, सावित्री देवी, हरमीत सिंह भोला, अमृतपाल सिंह, प्रदीप ढल्ल, कपिल किशोर, अश्वनी मल्होत्रा, जयप्रकाश, सुरजीत गिल, दिनेश मरवाहा, राकेश कुमार, संजीव मलिक, विपन शर्मा, अशोक कुमार आशु, सुरिंदर दत्त, सुरिंदर शर्मा, अहमद अली, गोल्डी अग्निहोत्री आदि ने भी स्व. जोगिंदर पाल पांडे को श्रद्धा सुमन भेंट किए। इन सभी के बोलों और शब्दों दर्द भी था, आस्था भी थी, सम्मान भी था लेकिन उन चुनौतियों का सामना  करने वाला वह संकल्प आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है। महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू की सोच वाली  कांग्रेस को बचाना बेहद ज़रूरी हो गया है। उस पुरानी कांग्रेस को बचा कर ही शायद देश को भी बचाया जा सके वरना बेचने वालों ने इसे बाजार में ला कर रख ही दिया है। 

अंत में चर्चा हरीश रावत की। उन्होने  श्री पांडे को याद करते हुए कहा है,पंजाब में अमन_शांति कायम रखने के लिये अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीद श्री जोगिंदर_पाल_पांडे जी की 34वीं पुण्यतिथि पर उन्हें शत्-शत् नमन एवं भावभीनी श्रद्धांजलि। उन्होंने अपनी बात के अंत में विशेष तौर पर अमर शहीद जोगिंदरपाल पांडे अमर रहे।

रविवार, 15 नवंबर 2020

मैं नेहरू की परछाई था--के एफ रुस्तमजी

Sunday:15th November 2020 at 9:07 AM

 नेहरुजी की  जयंती पर एल. एस. हरदेनिया की विशेष प्रस्तुति 

अगस्त 1942 में अंग्रेज़ो भारत  छोडो आंदोलन 
के दौरान महात्मा गांधी के साथ पंडित नेहरू
 
यह हमारे प्रदेश के लिए सौभाग्य की बात थी कि हमारे प्रदेश के आईपीएस कैडर के अधिकारी श्री के एफ  रुस्तमजी को छह वर्ष तक देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सुरक्षा करने का अवसर मिला। उन्हें 1952 में नेहरू जी की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी। वे नेहरू जी के साथ बिताए गए समय के अनुभवों को अपनी डायरी में नोट करते रहे। बाद में इन्हें एक किताब के रूप में प्रकाशित किया गया। इस किताब के  प्रकाशन में भी हमारे प्रदेश के दो आईपीएस अधिकारियों की प्रमुख भूमिका थी। यह दो अधिकारी थे श्री राजगोपाल और श्री के एस ढिल्लों।

नेहरू जी की जयंती के अवसर पर मैं उस किताब में प्रकाशित कुछ संस्मरणों को एक लेख के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं। किताब का शीर्षक है ‘आई वास नेहरूस शेडो’ (मैं नेहरू की परछाई था)। किताब पढ़ने से एहसास होता है कि नेहरू जी कितने महान इन्सान थे। वे कभी 8-10 साल के बच्चे नजर आते हैं और कभी एक महान, गंभीर, संवेदनशील, परिपक्व व्यक्ति नजर आते हैं। संस्मरणों से पता लगता है कि अपने देश से और देश की जनता से वे कितनी मोहब्बत करते थे। सच पूछा जाए तो उनसे बड़ा देशभक्त होने का दावा कोई नहीं कर सकता।

रुस्तमजी लिखते हैं उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने के कुछ समय बाद 1952 के अगस्त माह में मैं जवाहरलाल नेहरू के साथ कश्मीर गया। उस समय नेहरूजी की आयु 63 वर्ष थी, परंतु वे 33 वर्ष के युवक नजर आते थे। वे गोरे थे, अति सुंदर थे  और सभी को अपनी ओर खींचने वाले अद्भुत व्यक्तित्व के धनी थे। वे सेना के जवान के समान तेजी से चलते थे। चैंपियन के समान तैरते थे और लगातार 16 घंटे काम करते थे।

उनका स्वभाव घुमक्कड़ था। अवसर मिलने पर वे खुले मैदानों में टेंट में रहना पसंद करते थे। इसी तरह की यात्रा के दौरान एक दिलचस्प घटना हुई। 1952 में वे अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर थे। इंदिरा गांधी उनके साथ थी। यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात एक आदिवासी मुखिया से हुई। मुखिया ने उनसे कहा, “मैं तुम्हारी बेटी से शादी करना चाहता हूं”। नेहरु जी ने कहा, “वह तो विवाहित और उसके दो बच्चे हैं”। इस पर आदिवासी ने कहा, “क्या हुआ हमारे हमारे यहां तो रिवाज है कि हम बीवी के साथ बच्चे भी रख सकते हैं” ।

रुस्तमजी दो और महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख करते हैं। 1955 के मार्च में नेहरू जी नागपुर की यात्रा पर थे। एकाएक एक व्यक्ति नेहरू जी की कार पर चढ़ गया। उस व्यक्ति के हाथ में एक बड़ा सा चाकू था। नेहरू जी ने उससे पूछा, “क्या चाहते हो भाई” बस यह पूछकर नेहरू गंभीर होकर बैठे रहे। चेहरे पर चिंता की लकीर तक नहीं आई। एक दिन की बात है कि नेहरू जी बिना टोपी के तीन मूर्ति भवन (प्रधानमंत्री आवास) के एक गेट से बाहर निकले और बाद में दूसरे गेट से परिसर में प्रवेश करने लगे। गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी ने उन्हें रोक दिया। नेहरु जी ने अपना परिचय दिया पर वह मानने को तैयार नहीं था कि उसके सामने  नेहरुजी खड़े हैं। नेहरु जी की पहचान टोपी पहने हुए नेहरू की थी इसलिए सुरक्षाकर्मी उन्हें नहीं पहचान पाया। काफी देर तक नेहरू और सुरक्षाकर्मी के बीच विवाद होता रहा।

नेहरु जी ने एशिया और अफ्रीका के नवोदित देशों को एक मंच पर लाने में का महान प्रयास किया था। इसी महाप्रयास के तहत इंडोनेशिया के बांडुंग में एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसी बीच नेहरू जी की श्रीलंका के प्रधानमंत्री सर जॉन कोटेलावाला से किसी मुद्दे पर गर्मागर्म बहस हो गई। बहस के दौरान नेहरू जी बहुत आक्रोशित हो गये। इसी बीच नेहरु जी ने अपना हाथ ऊंचा उठा लिया। ऐसा लग रहा था कहीं वे कोटा वाला को तमाचा न मार दें। इंदिराजी पास में ही खड़ी थी। उन्होंने हिंदी में नेहरू जी से कहा कि वे संयम रखें। इसके बाद भी दोनों के बीच बहस चलती रही। दोनों स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की तरह लड़ रहे थे। चीन के प्रधानमंत्री बीच में पड़े और अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी में उन्होंने दोनों को समझाने की कोशिश की। इसके थोड़े समय बाद नेहरु जी ने सम्मेलन को संबोधित किया। नेहरू जी का भाषण अद्भुत था।

रुस्तमजी एक और दिलचस्प घटना का उल्लेख करते हैं। नेहरू जी अजंता की गुफाओं की यात्रा पर गए। उनके साथ लेडी माउंटबेटन भी थी। इस बीच लेडी माउंटबेटन ने कॉफी पीने की फरमाइश की और वे दोनों कॉफी  पीने के लिए बैठ गये। मैंने वहां से खिसकना चाहा। जब भी मैं उठना चाहता तो नेहरु जी कहते बैठो हम लोगों के साथ पत्रकारों और फोटोग्राफरों का हुजूम था। नेहरू जी नहीं चाहते थे कि लेडी माउंटबेटन के साथ कॉफी पीने से कुछ गलतफहमी पैदा हो।

रुस्तमजी के बाद 1958 में श्री दत्त प्रधानमंत्री के मुख्य सुरक्षा अधिकारी बने। दत्त ने इस पुस्तक के संपादक को बताया कि जब भी लेडी माउंटबेटन आती थीं विदा होती थी तो नेहरु और लेडी माउंटबेटन एक दूसरे के गालों को चूमते थे। ऐसा करना पश्चिमी परंपरा है। इसके अलावा मैंने उन दोनों के बीच कुछ नहीं देखा। अतः  दोनों के संबंधों को लेकर नेहरू को बदनाम करने के लिए जो बातें  फैलाई जाती हैं, वह बेबुनियाद हैं।

जनता के बीच रहने में नेहरूजी को भारी आनंद आता था। नियमों के चलते जनसभाओं में प्रधानमंत्री के मंच और जनता के बीच में काफी दूरी रखी जाती थी। एक स्थान पर मंच और जनता के बीच में कटीले तार लगा दिए गए। नेहरूजी ने यह देखा तो मंच से कूदकर कटीले तार हटाने लगे। ऐसा करते हुए उनके हाथों से खून आने लगा। जब उन्हें बताया गया कि उन्हें ऐसा नहीं करना था तो उन्होंने कहा, कि “जनता और मेरे बीच में फासला मुझे पसंद नहीं है। यदि ऐसा आगे हुआ तो प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा देने में मैं नहीं हिचकूंगा” ।

किताब के मुखपृष्ठ पर एक अद्भुत फोटो छपी है। फोटो में नेहरू जी एक बच्चे के समान कार के बोनट पर बैठे हैं और कुछ खा रहे हैं। साथ में रुस्तमजी बैठे हैं। नेहरूजी हास्यप्रिय व्यक्ति भी थे। एक दिन रुस्तम जी ने नेहरू जी से पूछा “क्या मैं आपका फोटो ले सकता हू” इसपर नेहरूजी ने कहा “क्या मैं अपना फोटो साथ लेकर चलता हू”? रूस्तमजी ने जवाब दिया “नहीं मैं आपकी फोटो लेना चाहता हूँ” यह सुनकर नेहरुजी ने कहा, “एक अच्छा  फोटोग्राफर फोटो लेने के पहले इजाजत नहीं मांगता”। (12 नवंबर 2020)

 

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

BJP महिला मोर्चा: साक्षी जुल्का ने दी अपने तीखे तेवरों में चेतावनी

महिला पर अभद्र टिप्पणी के विरोध में जलाया बाजवा का पुतला
लुधियाना: 19 नवंबर 2014: (रेक्टर कथूरिया//पंजाब स्क्रीन):
कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने जब भाजपा में शामिल हुई एक कांग्रेसी वर्कर पर अभद्र टिप्पणी की तो इसका विरोध काम से काम कांग्रेस में तो  था क्यूंकि यह मामला सियासी न हो कर महिला सम्मान और विचारों की स्वतंत्रता का था। किसी भी दल की विचारधारा अच्छी लगने पर उसमें शामिल होना महिला का अधिकार है।

इस अभद्र टिप्पणी पर कांग्रेस पार्टी और इसके नेता तो कुछ नहीं बोले लेकिन भाजपा से सबंधित महिला  कड़ा नोटिस लिया। केवल नोटिस ही नहीं लिया बल्कि कांग्रेस के पंजाब प्रमुख प्रताप सिंह बाजवा के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन भी किया। इस प्रदर्शन  उनका पुतला भी फूंका गया। प्रदर्शन में शामिल महिलाओं की संख्या बेशक कम थी पर जितनी महिलाएं थीं वे वहां दिल से मौजूद थीं। यह कम संख्या इस बात का सबूत कि भाजपा ने सत्ता में होने के बावजूद भाड़े पर भीड़ एकत्र नहीं की।
इस अवसर पर इस प्रदर्शन की अगवानी कर रही साक्षी जुल्का ने अपने तीखे तेवरों में चेतावनी दी कि महिला सम्मान पर किसी भी तरफ से आंच नहीं आने दी जाएगी।
BJP  महिला मोर्चा: साक्षी जुल्का ने दी अपने तीखे तेवरों में चेतावनी 

बुधवार, 21 मई 2014

Sinhala Sri Lankan Soldier

Alive after Attacking Rajiv Gandhi



Courtesy:songtamil//YouTube
Uploaded on Aug 27, 2011
He became an election candidate after he was in jail for few months. His crime is much higher then what the 3 tamils who are waiting for the death penalty did.